स्वर्ण रेखा को डस्टबिन मत बनाइए !

झारखण्ड की लाईफ लाईन कही जाने वाली स्वर्णरेखा आज शहरी कचरांे के बोझ से कराह रही है। झारखण्ड की राजधानी राँची के बीचोबीच बहने वाली ये नदी आज से दो दशक पूर्व तक सिंचाई और पीने का पानी का प्रमुख स्रोत हुआ करती थी। लेकिन लगातार शहरी सभ्यता के विकास ने स्वर्णरेखा और इसकी एक सहायक हरमू नदी को इस कदर प्रदूषित कर दिया है, कि अब इसके पानी से आचमन भी करना बीमारियों को आमंत्रित करने के जैसा है।

लगातार प्रदूषित हो रहे इस नदी को बचाने का संकल्प लिए “पर्यावरण संरक्षण मंच“ और ”सरोकार“ के कार्यकर्Ÿााओं ने एक अनूठी पहल शुरू की है, इसी पहल को आगे बढ़ाते हुए स्वर्णरेखा के उद्गम स्थल से काँवर में जल भरकर काँवरिएं की वेश में कार्यकŸााओं ने 24 किलोमीटर की नंगे पाँव पैदल याात्रा की, टी-शर्ट और तख्तियों में “स्वर्णरेखा को डस्टबिन मत बनाईए” स्लोगन लिखकर 6 लोग सुधीर शर्मा, सौरव कुमार, कृष्ण कुमार पोद्दार, संजीव गोस्वामी, मुकेश कुमार और फारूक ने करीब 10 घंटे में ये यात्रा पूरी की, यात्रा के दौरान सदस्यों ने राहगीरों से अपील की कि स्वर्णरेखा नदी राज्य की धरोहर है, इसे बचाने में सहयोग करें।

कार्यक्रम की शुरूआत राँची शहर से करीब 18 किलोमीटर दूर स्वर्णरेखा के उद्गम स्थल “रानीचुँआ” में पर्यावरण संरक्षण मंच के वरिष्ठ सदस्य अरूण सिंह ने नारियल फोड़ कर की, रानीचुँआ से कावँर में जल भरकर इस यात्रा की शुरूआत की। श्री सिंह ने कहा कि, केवल सरकार के भरोसे रहने से ही हमारी नदियां और प्राकृतिक संसाधन सुरक्षित नहीं रह सकते, एक सजग नागरिक होने के नाते हम सबका का भी कर्तव्य है, कि नदियों को बचाने की पहल करें, पैदल यात्रा को अभूतपूर्व बताते हुए उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण मंच का उद्देश्य ही लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना है, मंच विगत कई वर्षों से स्वर्णरेखा, हरमू और दामोदर नदी के संरक्षण की दिशा में लोगों को विभिन्न माध्यमों से जागरूक कर रहा है। ये पदयात्रा भी एक नई शुुरूआत है, जिसमें स्वर्णरेखा के उद्गम के पवित्र जल को काँवर में भरकर 24 किलोमीटर दूर स्वर्णरेखा और हरमू नदी के संगम के चट्टानों पर स्थित नागवंशीकालीन 21 शिवलिंगों पर जलाभिषेक किया जायेगा।

ज्ञात हो कि स्वर्णरेखा और हरमू नदी के संगम पर करीब 500 वर्ष प्राचीन नागवंशी कालीन “इक्कीसो महादेव“ नामक स्थल है, जहाँ के चट्टानों पर 21 शिवलिंग की आकृति उँकेरी हुई है। ये एक सांस्कृतिक धरोहर है, जो स्वर्णरेखा के बढ़ते प्रदूषण के कारण तेजी से मिटते जा रहे है। इस धरोहर को संरक्षित किया जाना आवश्यक है। 15-16 वीं शताब्दी में नागवंशी राजाओं के द्वारा बनाये गए इन शिवलिंगों की धार्मिक मान्यता है।

16वीं शताब्दी में तत्कालीन नागवंशी राजा लालप्रताप राय के द्वारा संगम के चट्टानों में बनाए गए 21 शिवलिंगों के अवशेष एक सांस्कृतिक उन्नत समाज को दर्शाता है, जहाँ की जनजातीय समाज की शिव भक्ति आज भी उनकी परम्पराओं में देखने को मिलती है।
लेकिन आज ये प्राचीन धरोहर अपनी दुर्दशा के आँसू बहा रहा है, सरकारी दस्तावेजों में शायद ही इस क्षेत्र के सम्बन्ध में कोई आधिकारिक रिकॉर्ड हो, लेकिन परम्पराओं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही जानकारियाँ नागवंशी राज्य की सांस्कृतिक श्रेष्ठता का बयान करती है। यहीं कारण है कि स्वयं चैतन्य महाप्रभु अपने पुरी की यात्रा के दौरान कई दिनों तक इस क्षेत्र में रहे। जिसके प्रमाण आज भी यहाँ के प्राचीन राम मन्दिर में देखने को मिलते हैं।

 

लोगों को जागरूक करना जरूरीः राकेश भास्कर

पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता की काफी कमी है। लोगों जानकारी के अभाव में नदियों में पूजन सामाग्री से लेकर घरों का कचरा भी बहा देते है। अगर हम वास्तव में अपने नदियों के संरक्षण के प्रति गंभीर है, तो हमें अपनी आदतें बदलनी होगी। लोगों को जागरूक करने की दिशा में काम करना होगा। सिविल सोसाईटी की यह जिम्मेवारी बनती है, कि वो अपने दैनिक जीवन में अपनी आदतों में परिवर्तन करते हुए दूसरों को भी जागरूक करें।पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता की काफी कमी है। लोगों जानकारी के अभाव में नदियों में पूजन सामाग्री से लेकर घरों का कचरा भी बहा देते है। अगर हम वास्तव में अपने नदियों के संरक्षण के प्रति गंभीर है, तो हमें अपनी आदतें बदलनी होगी। लोगों को जागरूक करने की दिशा में काम करना होगा। सिविल सोसाईटी की यह जिम्मेवारी बनती है, कि वो अपने दैनिक जीवन में अपनी आदतों में परिवर्तन करते हुए दूसरों को भी जागरूक करें। उक्त बातें पर्यावरण संरक्षण मंच के अध्यक्ष राकेश भास्कर ने जागरूकता यात्रा के संबंध में कहीं उन्होंने यात्रा के माध्यम से लोगों को जागरूक करने के इस प्रयास को एक सराहनीय कदम बताते हुए कहा कि, जबतक हम नदियों और पहाड़ों को आस्था के बिंदू से नहीं जोड़ते, तबतक हम अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा नहीं कर पायेंगे। स्वर्णरेखा नदी में प्रदूषण के बढ़ते स्तर पर उन्होंने कहा कि, स्वर्णरेखा राज्य की एक पवित्र नदी है, इस नदी में सोने के कण पाये जाते है। आज भी ग्रामीण क्षेत्र के लोग इस नदी के बालू से सोना निकालने की प्राचीन विधि से सोना निकाल कर अपना जीवन यापन करते है। हमें इस नदी को बचाने के लिए आगे आना चाहिए। नदी बचाना केवल सरकार का काम नहीं है, सरकार योजना बना सकती है, लेकिन योजनाएं तभी सफल होती है, जब सामुदायिक स्तर पर लोगों में अपनत्व की भावना का विकास हो। श्री भास्कर ने कहा कि मंच आने वाले दिनों में स्वर्णरेखा नदी और इक्कीसो महादेव दोनों को संरक्षित करने के लिए वृहŸा स्तर पर जन-जागरूकता अभियान चलायेगा। इस पदयात्रा के माध्यम से हम लोगों से सीधे संवाद करने में सफल हो पायेंगे।  उन्होंने लोगों से भी अपील करते हुए कहा कि स्वर्णरेखा को तभी बचााया जा सकता है, जब लोग इसे अपना कर्तव्य मानकर इसे बचाने में सहयोग करेंगे।

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तीन साल तक शोध कर निकालेंगे आर्सेनिक का तोड़

लेखक:
उमेश कुमार राय

गंगा नदी घाटी में आर्सेनिक की मौजूदगी और भविष्य में इसकी क्या स्थिति रहेगी, इसको लेकर व्यापक स्तर पर शोध होने जा रहा है।

इस शोध कार्य में भारत के चार संस्थानों के साथ ही यूके की भी चार संस्थाएँ हिस्सा लेंगी। शोध कार्य की फंडिंग यूके की संस्था नेचुरल एनवायरनमेंट रिसर्च काउंसिल (एनईआरसी) और केन्द्रीय विज्ञान व तकनीकी मंत्रालय करेंगे। इस प्रोजेक्ट पर करीब 8 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान लगाया गया है। केन्द्र सरकार 4 करोड़ रुपए उपलब्ध कराएगी और बाकी चार करोड़ रुपए नेचुरल एनवायरनमेंट रिसर्च काउंसिल की ओर से दिये जाएँगे।

भारत के महावीर कैंसर संस्थान व रिसर्च सेंटर, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, आईआईटी खड़गपुर आईआईटी रुड़की तथा यूके की मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी, सैलफोर्ड यूनिवर्सिटी, बर्मिंघम यूनिवर्सिटी और ब्रिटिश जियोलॉजिकल सोसाइटी यह शोध करेंगे।

गंगा नदी घाटी में आर्सेनिक को लेकर यह शोध अब तक का सबसे वृहत्तर शोध माना जा रहा है क्योंकि इसमें देश के पाँच राज्यों को शामिल किया गया है। सभी संस्थानों को शोध के लिये अलग-अलग राज्यों की जिम्मेदारी दी गई है। महावीर कैंसर संस्थान बिहार और झारखण्ड के साहेबगंज को लेकर शोध करेगा। आईआईटी खड़गपुर पश्चिम बंगाल को लेकर, आईआईटी रुड़की व आईआईटी खड़गपुर उत्तर प्रदेश और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी उत्तराखण्ड को लेकर शोध करेंगे। यूकी की संस्थाएँ इन संस्थानों के साथ मिलकर काम करेंगी।

शोध तीन वर्षों का होगा और अगर जरूरत पड़ी, तो इसमें एक साल का इजाफा किया जा सकता है।

गौरतलब है कि आईआईटी खड़गपुर और महावीर कैंसर संस्थान आर्सेनिक को लेकर लम्बे समय से काम कर रहे हैं। इन संस्थानों की ओर से आर्सेनिक को लेकर अब तक कई शोध किये जा चुके हैं।
जनवरी के आखिर में शुरू हो रहे इस शोध में मुख्य रूप से तीन बिन्दुओं पर फोकस रहेगा। इस सम्बन्ध में महावीर कैंसर संस्थान व रिसर्च सेंटर के रिसर्च विभाग के प्रमुख अशोक घोष बताते हैं, ‘शोध में तीन चीजों पर ध्यान दिया जाएगा। अव्वल तो यह पता लगाया जाएगा कि गंगा के मैदानी क्षेत्रों के एक्वीफर में आर्सेनिक की मौजूदगी कैसी है। यानी पहले हम यह देखेंगे कि एक्वीफर में कितना आर्सेनिक है। इसके बाद हम यह पता लगाएँगे कि आने वाले 25 से 30 सालों में एक्वीफर में आर्सेनिक की क्या स्थिति रहेगी और पानी के इस्तेमाल के लिये कौन-सा एक्वीफर सुरक्षित रहेगा। तीसरे हिस्से में हम इस पर शोध करेंगे कि आर्सेनिक की रोकथाम के लिये किस तरह के एहतियाती कदम उठाए जाने चाहिए।’

घोष बताते हैं, ‘असल में तीसरे हिस्से में हम यह पता लगाएँगे कि भूजल का प्रबन्धन किस तरह किया जाना चाहिए और इससे जुड़े साझेदारों की क्या भूमिका होनी चाहिए ताकि आर्सेनिक के खतरे से निबटा जा सके। शोध के आधार पर हम मशविरे भी देंगे। कुल मिलाकर शोध का आधार एक्वीफर में आर्सेनिक की मौजूदगी, इसके खतरे और इससे बचने की रणनीति होगा।’

उल्लेखनीय है कि इस शोध के लिये नेचुरल एनवायरनमेंट रिसर्च काउंसिल ने सार्वजनिक अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना पर देश व विदेश की 116 संस्थानों ने शोध कार्य करने की इच्छा जताते हुए आवेदन दिया था। इन आवेदनों का गहनता से अध्ययन करने के बाद 20 संस्थानों का चयन किया गया। सभी संस्थानों की तरफ से प्रेजेंटेशन दिया गया और इसी के आधार पर 8 संस्थानों का चुनाव किया गया।

अशोक घोष कहते हैं, ‘आर्सेनिक को लेकर हमने कई शोध किये हैं, इसलिये हम प्रजेंटेशन देकर अपनी बात बखूबी रख पाये कि शोध की रूपरेखा क्या होनी चाहिए, जिस कारण हमारे संस्थान को शोध के लिये चुन लिया गया।’

यहाँ यह भी बता दें कि गंगा नदी के मैदानी क्षेत्रों के एक्वीफर में प्राकृतिक तौर पर आर्सेनिक मौजूद है। जब भारी मात्रा में भूजल का दोहन किया जाता है और भूजल को रिचार्ज नहीं किया जाता, तो एक्वीफर में मौजूद आर्सेनिक पानी के साथ बाहर निकलने लगता है।

भारत में जल प्रबन्धन पर बहुत खास ध्यान नहीं दिया जाता है और चूँकि यहाँ की आबादी बहुत अधिक है, तो पानी की खपत भी ज्यादा होती है। इस वजह से भूजल का खूब दोहन किया जाता है। लेकिन, उसके रिचार्ज की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। आम लोगों में इसको लेकर जागरुकता का घोर अभाव है और सरकार की तरफ से पर्याप्त प्रयास भी नहीं किये जा रहे हैं। इस वजह से यहाँ आर्सेनिक का खतरा दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है।
जिन राज्यों को लेकर शोध होने जा रहा है, उन राज्यों में लाखों लोग आर्सेनिक की चपेट में हैं। बिहार की बात करें, तो यहाँ के करीब 16 जिलों के भूजल में आर्सेनिक है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ प्रीवेंटिव मेडिसिन में पिछले साल छपे एक शोध पत्र ‘ग्राउंड वाटर आर्सेनिक कॉन्टामिनेशन : ए लोकल सर्वे इन इण्डिया’ में गंगा के मैदानी क्षेत्र में स्थित बिहार के बक्सर जिले के सिमरी गाँव में पानी में आर्सेनिक को लेकर गहन शोध किया गया था। इसमें गाँव से पानी के 322 नमूने इकट्ठा किये गए थे। इन नमूनों की जाँच की गई तो पाया गया कि उक्त गाँव के हैण्डपम्प से निकलने वाले पानी में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य से अधिक थी।

इसी तरह पश्चिम बंगाल, झारखण्ड का साहेबगंज, उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड भी आर्सेनिक से बुरी तरह ग्रस्त है।

आर्सेनिक युक्त पेयजल के सेवन से फेफड़े, किडनी व ब्लाडर में कैंसर हो सकता है। इससे चर्मरोग हो जाता है और बदहजमी तथा ब्लड सर्कुलेशन भी बुरी तरह प्रभावित होता है।

आर्सेनिक पर काम करने वाले विशेषज्ञों की मानें, तो आर्सेनिक एक जानलेवा तत्व है। अगर लगातार आर्सेनिक युक्त पानी का सेवन किया जाये, तो लोगों को कैंसर हो सकता है और जान भी जा सकती है। डॉक्टरों के अनुसार आर्सेनिक की शिनाख्त होने पर मरीज को सबसे पहले साफ पानी उपलब्ध कराया जाना चाहिए और उसे आर्सेनिक से बचाव के लिये दवाइयाँ दी जानी चाहिए। इसके साथ नियमित तौर पर मरीज की जाँच भी जरूरी है।

पश्चिम बंगाल के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग की वेबसाइट के अनुसार पश्चिम बंगाल के कुल 9 जिलों के 79 ब्लॉकों में रहने वाले लगभग 1 करोड़ 66 लाख 54 हजार लोग आर्सेनिक के शिकंजे में हैं। यहाँ आर्सेनिक की शिनाख्त 3 दशक पहले वर्ष 1983 में ही कर ली गई थी। पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के गायघाटा व अन्य आर्सेनिक प्रभावित जिलों में आर्सेनिक के कारण कई लोगों की मौत भी हो चुकी है।

आईआईटी खड़गपुर की टीम को संस्थान के जियोलॉजी व जियोफिजिक्स विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर (हाइड्रोलॉजी) अभिजीत मुखर्जी लीड करेंगे। उन्होंने कहा कि शोध में ग्राउंड वाटर में केवल आर्सेनिक ही नहीं, दूसरे तरह के हानिकारक तत्वों की मौजूदगी की भी पड़ताल करनी है।

इस शोध के कुछ बिन्दुओं पर पहले कभी उस स्तर पर शोध नहीं किया गया, जिस स्तर पर होना चाहिए था, इसलिये यह अब तक हुए शोधों से ज्यादा फायदेमन्द होगा।
प्रो. मुखर्जी कहते हैं, ‘आर्सेनिक को लेकर पहले भी शोध किये जा चुके हैं, लेकिन जिन बिन्दुओं को लेकर हम शोध करने जा रहे हैं, उन पर बहुत कम काम हुआ है।’

बताया जा रहा है कि जिन राज्यों में शोध किया जाना है, उन राज्यों के उस हिस्से को शामिल किया जाएगा, जो गंगा के मैदानी इलाके में पड़ता है। जैसे कि उत्तर प्रदेश के वाराणसी को शोध के लिए चुना गया है।

पश्चिम बंगाल के किस क्षेत्र में शोध होगा, इसका चयन अभी नहीं हुआ है। प्रो मुखर्जी ने कहा कि वह पश्चिम बंगाल सरकार के साथ विमर्श कर स्थान का चुनाव करेंगे। लेकिन, सम्भवतः नदिया में शोध किया जा सकता है।

नदिया पश्चिम बंगाल का सबसे ज्यादा प्रभावित जिला है। 2014 में हुए एक शोध के अनुसार नदिया के सभी 17 ब्लॉक आर्सेनिक की जद में हैं। यहाँ के भूजल में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य से कई गुना अधिक है।

इसी तरह उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड भी आर्सेनिक के शिकंजे में है। बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश के करीब 30 जिलों के भूजल में आर्सेनिक है। उत्तराखण्ड के भी कुछ क्षेत्रों के ग्राउंड वाटर में आर्सेनिक देखने को मिल रहा है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2015 में सचिवों की एक कमेटी ने आर्सेनिक पर गहन छानबीन कर एक रिपोर्ट सरकार को दी थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि आर्सेनिक के कारण अब तक 1 लाख लोगों की मौत हो चुकी है। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा था कि करीब 7 करोड़ लोगों आर्सेनिक से प्रभावित हैं। इनमें से 3 लाख लोग ऐसे हैं जिन्हें आर्सेनिक ने अपनी जद में ले लिया है। रिपोर्ट में बताया गया था कि आर्सेनिक से निबटने के लिये 9700 करोड़ रुपए की जरूरत है।

रिपोर्ट में बताया गया था कि देश के 640 जिलों में से 96 जिलों के पानी में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य से पाँच गुना अधिक है।

टाइम्स ऑफ इण्डिया की एक रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में केन्द्र सरकार ने बताया कि भारत की 19 प्रतिशत आबादी आर्सेनिक युक्त पानी पी रही है। केन्द्र सरकार के आँकड़ों का जोड़-घटाव करने पर पाया गया कि आर्सेनिक से ग्रस्त सबसे अधिक लोग उत्तर प्रदेश में हैं। इस मामले में दूसरे स्थान पर बिहार, तीसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल, चौथे स्थान पर असम, पाँचवें स्थान पर पंजाब और छठे स्थान पर मध्य प्रदेश है।

इन राज्यों के अलावा गुजरात, हरियाणा, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु, झारखण्ड, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, छत्तीसगढ़, दिल्ली, ओड़िशा, मणिपुर, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में भी पेयजल में आर्सेनिक है।

कुल मिलाकर देखा जाये, तो भारत का एक बड़ा भू-भाग आर्सेनिक की चपेट में है।

सम्प्रति भारत में पानी में आर्सेनिक व अन्य खतरनाक तत्वों की मौजूदगी के जो आँकड़े सामने हैं, उसके मद्देनजर इस पर वृहत्तर शोध कार्य करने की जरूरत लम्बे समय से महसूस की जा रही थी, जो न केवल आर्सेनिक की मौजूदा स्थिति का पता लगाए बल्कि यह भी बताए कि आने वाले समय में इसकी विकरालता किस मुकाम पर पहुँचेगी और इससे बचने के सम्भावित उपाय क्या-क्या हो सकते हैं।

विशेषज्ञों को उम्मीद है कि यह शोध आर्सेनिक के मुद्दे से निबटने में काफी कारगर साबित होगा। यही नहीं, स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने की दिशा में भी यह शोध मील का पत्थर साबित हो सकता है।


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Coal pollution causes 70,000 deaths a year in India: IMF chief


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