आखिर भारत में सुबह ही क्यों दी जाती है फांसी? जानिये फ़िल्मी और हकीकत कहानी में क्या है अंतर

भारत में अब जघन्य अपराध के लिए फांसी दी जाती है…जैसे निर्भया के गुन्ह्गाह्गारों को दी यी थी जिन्होंने हैवानियत की साड़ी हदें पार कर दी थी… और अब खबर है कि अमरोहा की रहने वाली शबनम को फांसी की सजा दी जाने वाली है लेकिन कब होगी इसकी कोई तारिख अभी तक टी नही हुई… लेकिन फांसी से जुड़े कई बातें फिल्मों में दिखाई जाती है और हमें कहानियों में सुनने को मिलती है क्या वैसे ही असल में फांसी होती है? क्या सच में फांसी देने से पहले अपराधी से उसकी आखिरी इच्छा पूछी जाती है? फांसी सुबह ही क्यों दी जाती है? आइये इस वीडियो में जानते है.

अक्सर हमने फिल्मों और कहानियां में देखा और पढ़ा है कि अपराधी को फंसी देने वाले पहले उसकी आखिरी इच्छा पूछी जाती है लेकिन हकीकत में सिर्फ दो ही बातें पूछी जाती है कि वो आखिरी समय में क्या कुछ खास खाना चाहता है या किसी कोई पूजा करना चाहता है.  या फिर आखिरी समय से पहले उसकी वसीयत के बारे में भी पूछा जाता है..

दिल्ली जेल में लॉ अफसर रहे सुनील गुप्ता ने कुछ वक्त पहले मीडिया में बताया था, असल में  आखिरी इच्छा वाली कोई बात नहीं होती. मान लीजिए, अपराधी आखिरी इच्छा के तौर पर कह दे कि उसे फांसी नहीं दी जाए, तो उसकी बात नहीं मानी जा सकती या कोई भी ऐसी चीज़ मांग ले, जो आप नहीं दे सकते.यह भ्रम है, जेल मैनुअल में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है?”

मजिस्ट्रेट अपराधी से किसी वसीयत आदि के बारे में पूछते हैं. ये पूछते हैं कि आपको अपनी कोई जायदाद किसी के नाम करनी है, तो कर सकते हैं.वसीयत रिकॉर्ड हो जाने के बाद वो शख्स जल्लाद के हवाले कर दिया जाता है.

…….अब सवाल तो ये भी मन में आता है कि आखिर जब फंसी दी जाती है तो वहां कौन कौन मौजूद रहता है?

आमतौर पर फांसी के वक्त पांच लोगों को मौजूद रह जरूरी होता है. जेल सुपरिटेंडेंट, डिप्टी सुपरिटेंडेंट, असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट और मेडिकल अफसर और जिलाधिकारी द्वारा नियुक्त एक मजिस्ट्रेट भी वहां मौजूद रहता है, जो डेथ वारंट पर हस्ताक्षर करता है. इसके अलावा अगर अपराधी चाहे तो एक पुजारी फासी के स्थल पर मौजूद रह सकता है.

निर्भय के गुनहगारों को सुबह के वक्त फांसी दी गयी थी लेकिन शायद ही आपको पता हो कि अक्सर फांसी सुबह के वक्त ही दी जाती है.. इसके पीछे वजह है और वजह ये है प्रशासनिक, व्यावहारिक और सामाजिक..
फांसी एक ख़ास घटना होती है.. इसके लिए बड़ी तैयारी की जाती है.. अगर फंसी दिन में दी जाए तो पूरे जेल का फोकस इसी पर टिक जाता है. जेल की बाकी दिन भर की गतिविधयों पर इसका असर ना पड़े इसके लिए सुबह के वक्त फंसी दी जाती है. जब जेल में भी सबकुछ शांत रहता है.

कहा ये भी जाता है कि जिसे फांसी दी जाती है… उसका मानशिक संतुलन ये सोचकर बिगड़ सकता है कि उसे फांसी होने वाली है. सुबह के वक्त मन ज्यादा शांत रहता है. सोकर उठने के बाद फांसी देने पर वो ज्यादा शारीरिक तनाव और दबाव का शिकार नहीं होता. इसके साथ हो सुबह फांसी के बाद ही अपराधी के परिजनों को शव सौंप दिया जाए, ताकि वो उसे लेकर  जा सकें और दिन में ही अंतिम संस्कार कर सकें. अगर वे ले जाना चाहे तो इसके लिए भी आवदेन देना पड़ता है.

इन सबके साथ ही फांसी के वक्त जेल के बाहर बड़ी संख्या लोगों की भीड़ इकट्ठा होने की आशंका रहती है..हंगामा होने का भी डर रहता है.. सुबह के वक्त अधिकतर लोग सो रहे होते है.. सबके सोकर उठने से पहले फांसी की प्रक्रिया पूरी कर दी जाती है.