यहां की मछलियां नशे में रहती है धुत! इसके पीछे का कारण जान चौंक जाएंगे आप

आपने नशे में धुत लोगों के बारे में तो बहुत देखा और सुना होगा लेकिन क्या कभी आपने मछलियों को नशे में देखा है? इसका आप सिधा सा जवाब देंगे भला ऐसा कैसे हो सकता है..लेकिन यहां मैं आपको बता दूं कि ये बिल्कुल सत्य है..

दरअसल, कोरोना महामारी की वजह से हुए लॉकडाउन के कारण बैगा समुदाय के लोगों को खाने की संकट आ पड़ी है. इन लोगों के लिए दो वक्त ही रोटी भी जुटा पाना मुश्किल हो रहा है. ऐसे में ये बैगा समुदाय के लोग मछलियों को नशा देकर उसे आसानी से पकड़ लेते है और इसी मछलियों से अपने परिवार का पेट भरते है.

जी हां ऐसा ही हो रहा है मध्य प्रदेश के बालाघाट में..वहां रहने वाले बैगा समुदाय के आदिवासी अपना गुजारा करने के लिए ये तरीका अपना रहे है. ये लोग अपने आसपास के तलाब में पाई जाने वाली मछलियों को इसी तरीके से पकड़ अपना पेट भर रहे है. ये लोग ज्यादा संख्या में मछिलयों को पकड़ पाए इसके लिए ये लोग एक फल के जरिए मछिलयों को नशा देकर उन्हें बेहोश कर देते है, जिसके बाद आसानी से मछलियां पकड़ में आ जाती है..बता दें कि ज्यादा संख्या में मछलियों को पकड़ने की ये तरकीब बेहद पुरानी है.

इस तरकीब में ये आदिवासी जिस फल से मछलियों को नशा देते है उसे टोंडरी कहा जाता है. ये फल बहुत आसानी से जंगलों में मिल जाता है. आदिवासी इस फल को कूट कर अपने आसपास के नदी, नालों, तालाब और गड्ढ़ों में मिला देते है. मछलियां जैसे ही इसके संपर्क में आती है वो नशे की वजह से बेहोश हो जाती है..जिसके बाद बैगा समुदाय के लोग आसानी से उन्हें पकड़ अपना खाना बना लेते है.

यहां आपको ये भी बता दे कि बैगा समुदाय, भारत के मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड राज्यों में पायी जाने वाली जनजाति है. आज भी मध्य प्रदेश के मंडला डिंडोरी तथा बालाघाट जिलों में बैगा लोग बहुत बड़ी संख्या में रहते हैं. बैगा समाज के लोग प्रकृति के बेहद करीब रहते है. इस जनजाति के लोगों का आज भी रहन-सहन प्राचीन तौर-तरीकों पर ही निर्भर है. ये लोग प्राचीन परंपराओं को ही अपनाते हुए आज भी अपनी जिंदगी जी रहे है. ये लोग प्राचीन परंपरा के तहत ही मछलियों को नशा देकर अपने खाने के रूप में इसका इस्तेमाल करते हैं.