बरना पर्व: हरियाली संरक्षण के लिए एक अनोखा पर्व

भारत में त्योहारों का अपना महत्व है।  हर राज्यों में अलग-अलग संस्कृतियां और परंपराएं देखने को मिलती हैं।  इसी तरह हर राज्यों में त्योहार को अपने खास रंग-ढंग से मनाने की परंपरा भी सदियों से चलती आ रही है। ऐसे ही एक अनोखा पर्व है बरना पर्व। यह पर्व Bihar के थरुहट क्षेत्र में मनाया जाता है। यह पर्व अपने आप में अनोखा है इसमें लोग पेड़-पौधों की निगरानी के लिए हाथों में लाठी-डंडे थामते हैं। इतना ही नहीं इसमें 48 घंटे की अवधि के दौरान घास या तिनका तोड़ना तो दूर पेड़-पौधों को छूना (Protection of environment) भी मना है। आप को जान के हैरानी होगी की यह परंपरा 400 से अधिक साल पुरानी है और आज भी यहां थारू जनजाति के लोग इस परंपरा का पालन करते हैं।

400 साल से मन रहा पर्व

थारू समाज (Tharu Janjati) के लोग 16वीं शताब्दी से ही जंगल में गुजर-बसर कर रहे हैं. जंगल में रहते हुए उन्होंने एक देवी-देवता की पूजा की और हरियाली को बचाने का संकल्प लिया. तभी से इस अनूठे पर्व की शुरुआत हुई. इस पर्व के दौरान थारू जनजाति के लोग लाठी-डंडों से पेड़ पौधों की सुरक्षा करते हैं और मवेशियों के लिए चारा भी कई दिन पहले ही जमा कर लिया जाता है. इस दौरान फल और सब्जियों को भी तोड़ा नहीं जाता है।

पेड़ पौधों से पत्तियों को तोड़ने पर अर्थदंड

 इस पर्व के माध्यम से आने वाली पीढ़ी को हरियाली बचाने का संकल्प और पुरानी परंपरा की सीख दी जाती है। एक साथ सभी धारू के गांव में यह पर नहीं मनाया जाता है। मोहल्लेवार इसकी तारीख निर्धारित की जाती है। पर्व के दौरान कई बार लोग गलती में दातुन तोड़ लेते हैं, इस पर अंकुश लगाने के लिए अर्थदंड का प्रावधान भी है।

नौ कुंवारी कन्याओं की पूजा

इस पर्व में खासकर वनस्पति की पूजा के साथ दुर्गा स्वरूप कुंवारी कन्याओं की भी पूजा की जाती है. । बरना पर्व के अवसर पर गांव के लोगों के द्वारा गांव की नौ कुंवारी कन्याओं को मां दुर्गा स्वरूप मानते हुए उनकी पूजा अर्चना के बाद भोजन कराया जाता है. तत्पश्चात कन्याओं को खोईचा में अन्न और उपहार दिया जाता है।  इस पर्व के दौरान गांव के पीपल के पेड़ जिसे ग्रामीण ब्रह्म भी मानते हैं उसके नीचे श्रद्धा भाव से ग्रामीण कुंवारी कन्याओं की पूजा करते हैं और उनके पांव पखारने के बाद उन्हें भोजन के उपरांत यथोचित दक्षिणा में अन्न और पैसा देकर विदा करते हैं।

वातावरण का होता है शुद्धिकरण

बरना पर्व की परंपरा काफी पूर्व काल से चली आ रही है. पूर्वजों द्वारा इस पर्व को मनाने की शुरुआत भविष्य को बेहतर सोच के तहत की गयी थी. उन्होंने बताया कि इस पर्व के अवसर पर गांव वालों द्वारा वनस्पति वृक्ष, पौधों की पूजा की जाती है. 48 घंटे तक एक तरह से पूरे गांव में लॉकडाउन का सख्ती से पालन किया जाता है।  इस पर्व पर ग्रामीणों के द्वारा 48 घंटे तक लोगों की चहल-पहल शून्य हो जाती है. एहतियात बरतने से वातावरण पूरी तरह शुद्ध होता है।