जल संकट : 2060 तक उत्तर भारत में हो जाएगी ताजे पानी के भंडार में कमी

जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम अभी से ही देखने को मिल रहे हैं। मौसम चक्र बिल्कुल बिगड़ चुका है। मौसम के परिवर्तन के कारण हरित क्षेत्रो में अत्यधिक गर्मी और रेगिस्तान में बाद जैसे हालत बन गए है। यह सब बदलाव एक खतरनाक भविष्य की ओर इशारा कर रहे हैं। अगर हम सब ने अभी भी इस बदलाव की और धयान नहीं दिया तो निकट के भविष्य में परिणाम और भी भयानक होंगे। इन सब के बीच एक और चिंताजनक खबर सामने आयी है। एक अध्ययन में यह दावा किया गया है की जलवायु में हो रहे बदलाव से २०६० तक उत्तर भारत में ताजे पानी के भंडारण में भारी कमी आ सकती है, जिससे पानी की आपूर्ति पूरी तरह से चरमरा जाएगी।

एशिया का ‘वाटर टॉवर’ कहलाने वाला तिब्बत का पठार निचले प्रवाह क्षेत्र में रह रही करीब दो अरब आबादी को ताजा पानी की आपूर्ति करता है लेकिन कमजोर जलवायु परिवर्तन निति के कारण इस क्षेत्र में ताजे पानी की उपलब्धता में अपरिवर्तनीय कमी आ सकती है। अगर यह अनुमान सही है तो लोग पीने के पानी को लिए तरसेंगे। तब जो स्थिति पैदा होगी, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

2060 तक का समय, सुधर जाये लोग

अंतरराष्ट्रीय अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम  ने दावा किया है की कमजोर जलवायु परिवर्तन निति के कारण एशिया का ‘वाटर टॉवर’ कहलाने वाला तिब्बत का पठार के निचले क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता के लगभग 100 फीसदी नुकसान की आशंका है। यह अनुमान बिलकुल भी ाचा नहीं है। अगर ऐसा होता है तो मध्य एशिया और अफगानिस्तान में जलापूर्ति प्रणाली पूरी तरह से ध्वस्त हो सकती है, जबकि उत्तर भारत और पाकिस्तान की जलापूर्ति प्रणाली सदी के मध्य में ध्वस्त होने के करीब पहुंच सकती है। कमजोर जलवायु निति और लोगो का “चलता है ” रयइए के कारण से ऐसा हो रहा है लेकिन अभी भी लोगो के पास समय है। अगर सरकार अपनी नीतियों को सुधर कर उनका सकती से पालन करती है और लोग अपना रवैया सुधर ले तो इस भयानक आपदा को कुछ हद तक रोका जा सकता है।

2 अरब लोगों को पीने का पानी मुहैया कराते हैं पठार

तिब्बत के पठार करीब दो अरब लोगों की जल आवश्यकता के बड़े हिस्से की आपूर्ति करते हैं। जल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पूरे क्षेत्र में स्थलीय जल भंडार अहम है और यह जलवायु परिवर्तन के प्रति अति संवेदनशील है। यह पठार क्षेत्र में पानी की आपूर्ति करने में अहम भूमिका निभाते है।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण हो रही दिक्कत

अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि हाल के दशकों मे हुए जलवायु परिवर्तन की वजह से कई इलाकों में स्थलीय जल भंडार में (15.8 गीगाटन प्रति वर्ष की दर से) भारी कमी आ रही है जबकि कुछ इलाकों में उल्लेखनीय रूप से वृद्धि (5.6 गीगाटन प्रति वर्ष की दर से) हो रही है। उन्होंने बताया कि यह संभवत: ग्लेशियरों के पीछे खिसकने, मौसमी रूप से जमी हुई जमीन के क्षरण होने और झीलों के विस्तार के प्रतिस्पर्धी प्रभाव की वजह से हो रहा है।

मध्य एशिया और अफगानिस्तान पर पड़ेगा सबसे अधिक असर

सबसे अधिक जल उपलब्धता में कमी, मध्य एशिया और अफगानिस्तान को जलापूर्ति करने वाले अमु दरिया बेसिन और सिंधु नदी घाटी में आ सकती है जिससे पाकिस्तान और उत्तर भारत को जलापूर्ति होती है। अध्ययन के मुताबिक, इन दोनों नदी घाटियों की जलापूर्ति क्षमता में क्रमश: 119 प्रतिशत और 79 प्रतिशत की कमी आ सकती है।