कूनो में नामीबिया से आएंगे आठ चीते, NTCA को इंडियन ऑयल देगा 50 करोड़ रुपये

भारत में सात दशक बाद चीतों का फिर आगमन हो रहा है। नामीबिया से आठ चीते भारत आ रहे हैं। इन्हें मध्यप्रदेश के श्योपुर में स्थित कूनो-पालपुर नेशनल पार्क में रखा जाएगा। चीता प्रोजेक्ट के लिए इंडियन ऑयल ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) को 50.22 करोड़ रुपये देने का प्रावधान किया है। 

पहली चीता सेंचुरी

कूनो-पालपुर वन्यजीव अभयारण्य को 2018 में कूनो-पालपुर राष्ट्रीय उद्दान बनाया गया। नामीबिया से लाए जा रहे चार नर और चार मादा चीतों को यहां रखा जाएगा. वन विभाग के ग्राउंड स्टाफ़ चीतों के शिकार के लिए प्राकृतिक शिकार की भी व्यवस्था कर रहे हैं. कूनो-पालपुर राष्ट्रीय उद्दान के आस-पास पहले हज़ारों की संख्या में चीते पाए जाते थे। ये सभी चीते राजा-महाराजा, ब्रिटिश साम्राज्य के शौकिया खेलों की भेंट चढ़ गए. इनकी संख्या इतनी घट गई की आज़ादी के सिर्फ़ 5 साल बाद ही इन्हें जंगलों से विलुप्त घोषित कर दिया गया था। अगले 5 सालों में इनकी संख्या बढ़कर 20 हो सकती है. इससे पहले 1970 के दशक में भी ईरान से चीतों को भारत लाने की कोशिशें की गई थी। 75वें स्वतंत्रता दिवस पर भारत के जंगलों में एक और प्रजाति जुड़ने वाली है।

1972 में टाइगर प्रोजेक्ट

देश में टाइगर की कम होती संख्या को देखते हुए इंदिरा गांधी ने 1972 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरु किया था. उस समय देश में सौ से भी कम टाइगर बचे थे. आज इनकी संख्या तीन हजार के पार हो गयी है. टाइगर तो बचा लिया गया लेकिन चीते को भारत में फिर से बसाने का सपना पूरा नहीं हो सका. उस समय भारत और ईरान के बीच संबंध नया आकार ले रहा था. भारत ईरान से कच्चा तेल आयात कर रहा था और भारत से चावल मसाले ईरान भेजे जा रहे थे. तब इंदिरा गांधी के सामने एक प्रस्ताव रखा गया. ईरान में उस समय चीतों की संख्या ढाई सौ के करीब बताई गयी थी. इंदिरा गांधी चाहती थी कि ईरान भारत को कुछ चीते आयात करे जिन्हें खुले जंगल में बसाया जा सके. तब दोनों देशों के बीच बात कुछ आगे बढ़ी थी. भारत में मध्य प्रदेश के मैदानी जंगल, राजस्थान में जैसलमेर का थार मरुस्थल और दक्षिण भारत में कर्नाटक के जंगल चीता का क्या नया घर बन सकता है. इस पर वन्यजीव विशेषज्ञ गंभीर चर्चा कर रहे थे लेकिन तभी ईरान में खूनी क्रांति हो गयी, शाह का तख्तापलट हो गया और साथ ही चीते को भारत लाने का सपना भी वहीं दफन हो गया. अब नये सिरे से सपना आकार लेने लगा है।

1948 में आखिरी बार देखा गया था चीता

भारत में आखिरी बार चीता 1948 में देखा गया था। इसी वर्ष छत्तीसगढ़ में राजा रामनुजप्रताप सिंह ने तीन चीतों का शिकार किया था। इसके बाद भारत में चीतों को नहीं देखा गया। इसके बाद 1995 में भारत ने चीतों का अस्तित्व खत्म होने की घोषणा कर दी थी।

748 वर्ग किमी में फैला है कूनो-पालपुर पार्क

कूनो-पालपुर नेशनल पार्क 748 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यह छह हजार 800 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले खुले वन क्षेत्र का हिस्सा है। यहां चीतों को बसाने की तैयारी पूरी कर ली गई है। 15 अगस्त तक चीतों को लाने की योजना है। चीतों को लाने के बाद उन्हें सॉफ्ट रिलीज में रखा जाएगा। दो से तीन महीने वे बाड़े में रहेंगे। ताकि वे यहां के वातावरण में ढल जाए। इससे उनकी बेहतर निगरानी भी हो सकेगी। चार से पांच वर्ग किमी के बाड़े को चारों तरफ से फेंसिंग से कवर किया गया है। जिन आठ चीतों को लाया जा रहा है, उनमें चार नर और चार मादा है। चीता का सिर छोटा, शरीर पतला और टांगे लंबी होती हैं। यह उसे दौड़ने में रफ्तार पकड़ने में मददगार होती है। चीता 120 किमी की रफ्तार से दौड़ सकता है।  

सहारिया जनजाति की बेहतरी पर करें काम

वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट अजय दुबे का कहना है कि चीता प्रोजेक्ट का असर सहारिया जनजाति के लोगों पर पड़ेगा। सॉफ्ट रिलीज के बाद चीतों को खुला छोड़ा जाएगा। सहारिया जनजाति के लोगों की गुजर-बसर जंगल से होने वाले उत्पादों से होती है। ऐसे में सरकार को उनके रोजगार के इंतजाम पर भी ज्यादा फोकस करना चाहिए।