ऑक्सीजन की नही क्रायोजेनिक टैंक की है देश की कमी! जानिए भारत में कितने टैंकर हैं?

भारत में इस वक्त सभी राज्य ऑक्सीजन की मांग कर रहे हैं लेकिन क्या आपको ये पता है कि इस वक्त भारत में ऑक्सीजन की कनी नही है बलकी कमी है उस टैंक की जिसमें भारत ऑक्सीजन एक जगह से दुसरे जगह भेजे जाते हैं ..
आइये इस वीडियो में यही देखते हैं कि आखिर कैसे बनता है ये टैंक? कितना खर्चा आता है और इस टैंक को विदेशों से क्यों मंगवाया जा रहा है.

आपको शायद ही पता हो कि दरअसल क्रायोजेनिक टैंक की कमी के चलते ही समय पर सभी जगह ऑक्सीजन की सप्लाई में काफी परेशानी आ रही है। क्योंकि, ऑक्सीजन की सप्लाई इन टैंक के बिनी मुमकिन ही नहीं। क्रायोजेनिक टैंक का इस्तेमाल सिर्फ उन्हीं गैसों के लिए ही होता है, जिन्हें बेहद ठंडी परिस्थितियों में रखना पड़ता है लिक्विड ऑक्सीजन, लिक्विड हाइड्रोजन के अलावा नाइट्रोजन और हीलियम के ट्रांसपोर्ट के लिए भी क्रायोजेनिक टैंक की ही जरूरत होती है ऑक्सीजन को टैंक के अंदर माइनस 185 से माइनस 93 के टेंपरेचर में रखा जाता है.. एक क्रायोजेनिक टैंक तैयार होने में 25 लाख से 40 लाख रुपए तक का खर्च आता है.

क्रायोजेनिक टैंक में कई परत होती है. वैसे क्रायोजेनिक टैकर दो प्रकार के होते हैं एक जिसमें सिर्फ स्टोर किया जाता है और दूसरा जिसके जरिये आक्सीजन ट्रांसपोर्ट किया जाता है .. भारत में कंपनियों के पास ऐसे ट्रांसपोर्ट क्रायोजेनिक की संख्या 1500 के ही करीब है, लेकिन इनमें से करीब 220 टैंक सेफ्टी सर्टिफिकेट रिन्यूअल न मिलने के चलते  निष्क्रिय हैं। इस तरह देश मेंइन टैंक की संख्या 1250-1300 के बीच ही है.. अब जब अचानक से देश में आक्सीजन की मांग बढ़ गयी तो टैंकर कम होने की वजह से आक्सीजन होते हुए भी लोगों तक नही पहुँच पाया..
पिछले साल भी क्रायोजेनिक टैंकर की कमी महसूस हुई थी लेकिन तब किसी तरह से मौजूद टैकरों से स्थिति से कंट्रो ,एम् आ गयी थी लेकिन इस बार टैकरों की अधिक आवश्यकता है. यही वजह है कि भारत अन्य देशों से ऐसे टैकरों की आयात कर रहा है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मंगलवार को कहा कि देश में चिकित्सीय ऑक्सीजन के परिवहन के लिए कंटेनरों की एक खेप थाईलैंड से भारत पहुंच गई है जबकि सिंगापुर से कुछ और खाली टैंकर वायु मार्ग से मंगाए जा रहे हैं।

टैकरों के आयात के लिए सरकार के साथ साथ कारोबारी भी लगे हुए हैं.. दारास्ल क्रायोजेनिक के निर्माण में वक्त अधिक लगता है. इसीलिए सरकार निर्माण को किनारे रख तत्काल मदद के लिए विदेशों से आयात कर रही है.