धर्मपाल सैनी, जिन्होंने CRPF जवान राकेश्वर सिंह को नक्सलियों से करवाया रिहा

बीजापुर में हुए नक्सली हमले के बाद नक्सलियों ने CRPF के एक जवान को अगवा कर अपने साथ ले गये इसके बाद सरकार से शर्तों के साथ बातचीत करने का प्रस्ताव रख दिया.. लेकिन मामला आगे नही बढ़ पाया.. कई लोगों ने जवान को छुड़ाने के लिए नक्सलियों से बातचीत करने की कोशिश की लेकिन कोई फायदा नही हुआ.. आखिरकार 6 दिन बाद नक्सलियों ने जवान राकेश्वर सिंह को रिहा कर दिया..
राकेश्वर सिंह की रिहाई के पीछे 90 बरस के स्वतंत्रता सेनानी धर्मपाल सैनी की बड़ी भूमिका मानी जा रही है. इन्हें बस्तर का गांधी भी कहा जाता है लोग प्यार से ताऊजी भी कहते हैं.
बस्तर के ताऊजी या फिर बस्तर के गांधी कहलाने वाले धर्मपाल सैनी को सरकार की ओर से पद्मश्री का सम्मान भी मिला है। 6 दशकों से बस्तर के लिए समर्पित धर्मपाल सैनी का आदिवासियों और नक्सलियों के बीच भी सम्मान है। जगदलपुर में बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी. ने जानकारी दी कि जवान को रिहा कराने में सैनी और बोरैंया के अलावा माता रुक्मणि आश्रम जगदलपुर, आदिवासी समाज के कई लोगों और बीजापुर के पत्रकार गणेश मिश्रा और मुकेश चंद्राकर का सराहनीय योगदान रहा। हम बात कर रहे हैं धर्मपाल सैनी की..

धर्मपाल सैनी करीब 45 साल पहले पहली बार बस्तर आए थे और बस्तर के ही होकर रह रह गए। उनके यहां आने के बाद से बस्तर में बदलाव क्या हुआ, कैसे उन्होंने लोगों के दिलों में अपनी जगह बनायी? इसपर एक नजर डालते हैं.. धर्मपाल सैनी के बस्तर पहुँचने के बाद वहां का साक्षरता अनुपात 10 प्रतिशत से बढ़कर करीब 50 प्रतिशत हो चुका है। धर्मपाल सैनिक ने अपने प्रयासों से अब तक 2 हजार से ज्यादा एथलीट तैयार कर चुके हैं और उनके आश्रम में पढ़ी जाने कितनी लड़कियां आज डॉक्टर, इंजीनियर और प्रशासनिक अधिकारी बन चुकी हैं.


धर्मपाल सैनी के बस्तर जाने के पीछे भी बस एक अजीब खबर थी !

दरअसल एक खबर सामने आई थी कि दशहरा के मेले से लौटने के दौरान कुछ लड़कों ने लड़कियों के साथ छेड़छाड़ कर दी। लड़कियों ने उन लड़कों के हाथ-पैर काट कर उनकी हत्या कर दी थी। सैनी ने जब ये खबर सुनी तो वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसी समय बस्तर आने और यहां की लड़कियों के लिए कुछ करने का फैसला कर लिया था..हालाँकि बस्तर पहुँचने भी कई साल लग गये..
धर्मपाल सैनी भूदान आंदोलन के प्रणेता विनोबा भावे के शिष्य थे.. जब धर्मपाल सैनी ने विनोबा भावे से बस्तर जाने की अनुमति मांगी तो इंकार कर दिया गया. कई बार आग्रह करने के बाद विनोबा भावे जी ने उन्हें 5 रुपये का एक नोट देकर बस्तर के लिए इस शर्त पर विदा किया कि वे कम से कम दस साल वहां रहेंगे।
कहा जाता है कि सैनी बीते कई महीनों से सरकार और नक्सलियों के बीच शांति वार्ता के लिए प्रयास कर रहे थे। वे धीरे-धीरे इस दिशा में आगे बढ़ रहे थे, लेकिन बीच में केंद्रीय बलों ने नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन छोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि बातचीत की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही पटरी से उतर गई। राकेश्वर सिंह के नक्सलियों के कब्जे में होने की पुष्टि होने के बाद जब मुख्यमंत्री बघेल ने उनसे अनुरोध किया तो सैनी एक्टिव हुए और उनकी रिहाई में अहम भूमिका निभाई..
बालिका शिक्षा इसी योगदान के लिए धर्मपाल सैनी को साल 1992 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया था।