इंसानो की वजह से 850 से भी ज्यादा प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर, रहने लायक नहीं बचेगी यह दुनिया

जलवायु परिवर्तन या क्लाइमेट चेंज (Climate Change) से हम सभी वाकिफ़ हैं। प्राकृतिक दुनिया संकटग्रस्त है और इसके लिए हम ज़िम्मेदार हैं।  क्लाइमेट चेंज का पृथ्वी और पृथ्वी पर रह रहे जीव-जन्तुओं पर खासा दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक हम लोग छटवे  विलुप्तीकरण के बीच में है। इंसानी गतिविधियों की वजह से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, पर्वतों की बर्फ़ पिघल रही है।  इंसानो ने विकास के नाम पर जंगलो को बड़ी तेजी से काट दिया है और दूसरे जीव-जन्तुओं के जंगल उनसे छीन लिए है। हरे भरे जंगलो के स्थान पर इंसानो में कंक्रीट के जंगल बना दिए है। इंसानो की इसी गतिविधियों के कारण कई प्रजातियां विलुप्त हो चुकी है और कई विल्पुत होने के कगार पर है।

मिली बड़ी चेतावनी

एक रिपोर्ट के मुताबिक छटवा विलुप्तिकरन मानव इतिहास में प्रजातियों का सबसे बड़ा नुकसान है। रिपोर्ट के मुताबिक मीठे जल की 33% प्रजातियां, 40% उभयचर, 84% बड़े स्तनधारी, 33% भित्तियां बनाने वाली प्रवाल और 33% ओक के पेड़ विलुप्त होने के कगार पर है। जिस तरह से गैंडों और हाथियों का शिकार हो रहा है कि 2034 तक उनकी प्रजाति विलुप्त हो सकती है। एक शोध के मुताबिक आने वाले 30 सालों में 1.53 मिलियन वर्ग किलोमीटर तक अर्बन एक्सपैंशन हो सकता है। इस स्टडी में पता चला है कि इंसानी गतिविधियों की वजह से आने वाले समय में 850 से ज़्यादा प्रजातियां धरती से पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी. इन प्रजातियों मे सबसे ज़्यादा ख़तरा इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर पाए जाने वाले Javan Slow Lori: मेक्सिको और ग्वाटेमाला में पाए जाने वाले पक्षी पिंक-हेडेड वॉर्बलर पर है।

चार में से एक प्रजाति विलुप्ति के कगार पर

जिन वनस्पतियों और जीवों पर ख़तरा मंडरा रहा है उनका ज़िक्र करते हुए रिपोर्ट कहती है कि मानवीय गतिविधियां पहले की तुलना कहीं अधिक प्रजातियों को जोखिम में डाल रही हैं. पौधों और जीव समूहों की करीब 25 फ़ीसदी प्रजातियां विलुप्त के ख़तरे का सामना कर रही हैं।

मूल निवासियों और स्थानीय समुदायों द्वारा कई प्रयास होने के बावजूद 2016 तक, पालतू स्तनधारी पशुओं की 6,190 में से 559 प्रजातियां विलुप्त हो गईं. उनका इस्तेमाल भोजन तैयार करने और कृषि उत्पादन में किया जाता था। रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर स्थानों पर पहले की तुलना में कहीं अधिक भोजन, ऊर्जा और सामग्री को पहुंचाया जा रहा है लेकिन ऐसा प्रकृति की क़ीमत पर हो रहा है और भविष्य में यह योगदान जारी रखने की उसकी क्षमता प्रभावित हो रही है।

इन जीवों पर मंडरा रहा संकट

रिपोर्ट में आशंका जताई गयी है की दुनिया में जीव बहुत तेजी से विलुप्त हो सकते हैं। अफ्रीका के जंगलों में पाए जाने वाले हाथी पर सबसे अधिक विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। बीते 31 साल में 86 प्रतिशत हाथियों की संख्या कम हो गई है। आर्कटिक समुद्र में बर्फ बहुत तेजी से पिघल रही है। इसकी वजह से ध्रुवीय भालु विलुप्त हो सकते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि जलवायु संकट और समुद्र में बहुत अधिक मछली पकड़ने की वजह से शार्क की संख्या में 30 प्रतिशत की कमी हो गई है। जर्मनी में मिलने वाले मेढक और टोड्स भी इस महाविनाश में खत्म हो जाएंगे। 

समुद्री प्रदूषण में दस गुना वृद्धि

समुद्री जल में प्लास्टिक प्रदूषण में 1980 के बाद से 10 गुना बढ़ोत्तरी देखने को मिली है जिससे कम से कम 267 प्रजातियों के लिए ख़तरा बढ़ गया है. इनमें 86 फ़ीसदी समुद्री कछुए, 44 फ़ीसदी समुद्री पक्षी और 43 प्रतिशत समुद्री स्तनपायी जीव हैं।