Health Update : नेत्रहीन लोगों के लिए एक बड़ी खुशखबरी, एक बार फिर देख सकेगें दुनिया

पूरी दुनिया में दृष्टिहीन लोगों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. दृष्टिहीनता से पीड़ित लोगों का आंकड़ा 2006-07 में 1.2 करोड़ था, जो 2019 में घटकर 48 लाख पर आ गया है .ऐसे में स्पेन के वैज्ञानिकों ने दृष्टिहीन लोगों के लिए दुनिया देखने के लिए एक ऐसा चश्मा बनाया हैं. जिससे नेत्रहीन लोग एक बार फिर इस रंगबिरंगी दुनिया को देख सकेगें.

Histoplasmosis and Old Disciform Macular Scar - Retina Image Bank
हाल ही में स्पेन के वैज्ञानिकों ने एक चश्मा बनाया हैं. दरअसल इस चश्मे के बीच में आर्टिफिशियल रेटिना लगाया गया है. इस रेटिना को दिमाग में लगे इम्प्लांट से जोड़ा गया हैं. जैसे ही रोशनी इस रेटिना पर पड़ेगी. वह इलेक्ट्रिक्ल सिग्नल इम्प्लांट को भेजेगां. फिर ये इम्प्लांट उस रोशनी को एनालिसिस करके दिमाग के विजुअल कॉरटेक्स में रेटिना के सामने दिख रही चीजों की तस्वीर बना देता है.

The Future for Bionic Eyes - MedicalExpo e-Magazine

शोधकर्ताओं ने इस चश्मे और इम्प्लांट का परीक्षण एक 57 वर्षीय महिला पर किया हैं. जो कि पिछले 16 सालों से कुछ भी नहीं देख पा रही थी. वह महिला पूरी तरह से दृष्टिहीन थीं. लेकिन ब्रेन में इम्प्लांट लगने के बाद जैसे ही महिला ने आर्टिफिशियल रेटिना वाले चश्में को आंखों पर लगाया तो उनके सामने दिखने वाली चीजों की इमेज उनके दिमाग में बनने लगी. उन्होंने यह भी बताया कि उनके सामने किस तरह की चीजें रखी हैं.

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वैज्ञानिकों ने जानकारी देते हुए कहा कि इस तकनीक की मदद से हम दिमाग के उन न्यूरॉन्स को सक्रिय कर देते हैं. जिनसे दिमाग में आर्टिफिशियल रेटिना के सामने दिख रही चीजों की बाहरी आकृति दिखने लगती है. यानी की आकार स्पष्ट हो जाता है.

FDA approval for second sight's argus II bionic eye

जानकारी के अनुसार दिमाग में लगाया गया ये इम्प्लांट सिर्फ 4 मिलीमीटर चौड़ा था. इसके अंदर लगे माइक्रोइलेक्ट्रोड 1.5 मिलीमीटर लंबे थे. इन्हें दिमाग में इस तरह से लगाया जाता हैं कि यह विजुअल कॉरटेक्स में होने वाले इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी को सक्रिय कर सकें. साथ ही उस हिस्से में हो रहे इलेक्ट्रिकल बहाव की निगरानी भी कर सकें.

bionic eye - PreScouter

यह इम्प्लांट दिमाग के ठीक ऊपर एक पतली परत की तरह लगाया जाता है. इस तकनीक से हो सकता है कि कुछ लोग घबराये और वो अपने दिमाग में माइक्रोइलेक्ट्रोड से लैस इम्प्लांट लगवाने से हिचके लेकिन अगर इस तरीके से दृष्टिहीन लोग देख सकते हैं, तो इसमें कोई बुराई नहीं है.

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हालांकि, वैज्ञानिकों ने इस महिला के दिमाग से 6 महीने बाद ही इस इम्प्लांट को निकाल लिया था. अब आप ये सोच रहे होंगे की अखिरकार वैज्ञानिको ने ऐसे क्यों किया. तो चलिए आपके इस प्रश्न का भी उत्तर दे देते हैं.

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इस तकनीक का महिला के उपर परीक्षण से पहले करीब 1000 इलेक्ट्रोड वर्जन का बंदरों पर ट्रायल किया गया था. जिन वैज्ञानिको ने इस तकनीक का परीक्षण किया वो वैज्ञानिक मिगुएल हरनैंडेज यूनिवर्सिटी के हैं.

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दरअसल वैज्ञानिकों का कहना है कि महिला के दिमाग से इम्प्लांट निकालने का फैसला इसलिए किया गया ताकि उसमें और सुधार किया जा सके. उसे और भी अत्याधुनिक बनाया जा सके. इसे बड़े पैमाने पर उत्पादन करने के लिए जरूरी है कि यह इम्प्लांट और ज्यादा बेहतर हो. भविष्य में उम्मीद है कि ब्रेन इम्प्लांट और जीन-एडिटिंग तकनीकों के जरिए विभिन्न प्रकार की दृष्टिहीनता को खत्म किया जा सकता है.

 

STORY BY – UPASANASINGH