पाकिस्तान का हुंजा समुदाय, जहाँ की महिलायें 60 साल की उम्र में भी देती है बच्चों को जन्म!

एक तरफ जहाँ खान पान और रहन सहन की वजह से लोगों का जीवन पहले की तुलना में कम होता जा रहा है वहीँ पाक्सितान का एक समुदाय है जो आज भी लगभग 120 साल तक की जिन्दगी जीते हैं.. इतना ही नही पाकिस्तान में रहने वाली इस समुदाय की महिलाएं 80 साल की उम्र में भी महज 30-40 की लगती हैं

हम बात कर रहे हैं हुंजा समुदाय के बारे में, जो उत्तरी पाकिस्तान की काराकोरम पहाड़ियों में स्थित हुंजा घाटी में रहते हैं। कहते हैं कि यहां के लोग औसतन 120 साल तक जिंदा रहते हैं।  हुंजा समुदाय के लोगों को बुरुशो भी कहते हैं। ये बुरुशास्की भाषा बोलते हैं। कहा जाता है कि ये समुदाय सिकंदर की सेना के वंशज हैं, जो चौथी सदी में भारत आए थे।.. लेकिन कमजोरी या लड़ाई में घायल होने के कारण लौटने की हालत में नहीं रहे. तब सिंकदर की सेना को उन्हें यहीं छोड़कर वापस लौटना पड़ा.

अगर अन्य पाकिस्तानी समुदाय की तुलना में हुंजा समुदाय के लोग कहीं ज्यादा शिक्षित हैं. यहां समुदाय के भीतर ही स्कूल चलते हैं और लड़के-लड़कियों की पढ़ाई में कोई फर्क नहीं रखा जाता है. हुंजा घाटी में इनकी संख्या 85 हजार से भी ज्यादा हैं। यह समुदाय मुस्लिम धर्म को मानता है और इनके सारे क्रियाकलाप भी मुस्लिमों जैसे ही हैं।

हालाँकि सबसे हैरानी वाली बात सिर्फ ये है कि इनकी सेहत का राज.. आपको जानकारी हैरानी होगी कि यहाँ के लोग 120 साल तक जिन्दा रहते हैं..  90 साल की उम्र में भी महिलायें माँ बन सकती है और पुरुष बाप!

90 साल की उम्र में यहाँ की महिलाओं का माँ बन्ना वैज्ञानिकों को भी परेशान करता है क्योंकि आमतौर पर 50 साल की  उम्र पार करते करते शरीर में बदलाव के चलते महिलाएं माँ नही बन पाती! लेकिन हुंजा महिलाओं के साथ ऐसा नही है..


इन सबके पीछे की वजह को हुंजा समुदाय के खानपान को माना जाता रहा है. वे पूरी तरह से ऑर्गेनिक खाना खाते हैं. फल-सब्जियों का उनके भोजन में बड़ा हिस्सा होता है. भोजन में वे खूबानी को खासतौर पर शामिल करते हैं. खूबानी वह फल है जिसे हुंजा समुदाय के लोग काफी शौक से खाते हैं. खूबानी में कई पोषक तत्व होते हैं जो कैसर तक की बीमारी से लड़ने में मददगार साबित होता है. इस समुदाय के लोग शारीरिक और मानसिक तौर पर बहुत मजबूत होते हैं। कहते हैं कि यहां के लोगों की जीवनशैली ही उनके लंबे जीवन का राज है। ये लोग सुबह पांच बजे उठ जाते हैं। यहां के लोग साइकिल या गाड़ियों का इस्तेमाल बहुत कम ही करते हैं और पैदल ज्यादा चलते हैं। इनका खाना भी पूरी तरह कुदरती होता है, मतलब कि उनकी सब्जियों, दूध, फल, मक्खन आदि में किसी तरह की मिलावट नहीं होती है एक हैरानी बात और कि ये लोग मांस का सेवन कम ही करते हैं.. करते है किसी ख़ास अवसर पर! वो भी बहुत लिमिटेड !