पर्यावरण से जुड़ी ये काम की बातें आपको पता होनी ही चाहिए !

पर्यावरण को लेकर हम सभी लोग जागरूक है और उसको बचाने की अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिस करते है । लेकिन फिर भी कही न कही कोई कसर रह जाती है। पर्यावरण के प्रति जागरूक रहने और दुसरो को जागरूक करने से पहले आइये जान लेते है कुछ पर्यावरण से जुडी कुछ काम की बाते।

ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज दोनों अलग अलग बाते है

ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज दोनों अलग अलग बाते है लेकिन अक्सर लोग इन्हे एक ही बात समझने की गलती करते है। ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ है वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों की बढ़ती सांद्रता के कारण पृथ्वी की सतह का तापमान बढ़ जाना जबकि क्लाइमेट चेंज का मतलब जल वायु में परिवर्तन होना है। ग्लोबल वार्मिंग  क्लाइमेट चेंज यानी जलवायु परिवर्तन का एक पहलू है, जो समुद्र स्तर के बढ़ने, उष्णकटिबंधीय तूफानों के बढ़ने, ग्लेशियरों के पिघलने, कोरल रीफ के घटने, भयानक गर्मी के साथ-साथ ग्लोबल वार्मिंग के रूप में पर्यावरण में परिवर्तन करता है।

आप कुछ न भी जलाएं, तो भी कार्बन उत्सर्जन के जिम्मेदार हैं

आपकी पसंद अप्रत्यक्ष रूप से वायुमंडल में कार्बन उत्सर्जन कर सकती है। अगर आप मांसाहारी हैं, तो आप जिम्मेदार हैं. मीट उत्पादन से मीथेन उत्सर्जन के सबसे बड़े कारणों में से एक है। आप अपने प्लास्टिक के कचरे को रीसाइकिल नहीं करते और हर मौसम में ACका इस्तेमाल करते हैं तो आप जिम्मेदार है। अगर आप काम पर जाने के लिए ड्राइव करते हैं या कैब लेते हैं, तो आप जिम्मेदार हैं। ये सभी आपकी पसंद के मामले है और यह सब कार्बन उत्सर्जन के जिम्मेदार हैं।

सिंगल यूज़ प्लास्टिक का विरोध क्यों ?

 सिंगल यूज़ प्लास्टिक की चीजे एक बार इस्तेमाल होती है और बाद में ये प्लास्टिक के ढेर के रूप में महासागरों में जमा हो जाती है। बोतलें, पैकिंग, बैग, डिस्पोजेबल रेज़र, स्ट्रॉ, ईयरबड, फूड कंटेनर- ये सभी सिंगल यूज प्लास्टिक ही हैं. इन्हें नष्ट होने में दशकों, कभी-कभी सदियों का समय लगाता है। प्लास्टिक की एक बोतल को गलने में कम से कम 500  साल लगते है। बार बार same  प्लास्टिक reuse करना हमारी सेहत के लिए भी हानिकारक है।  इस से अच्छा है की हम सभी बायो डिग्रेडेबल चीज़ो को अपनाये।

पेड़ लगाने से क्लाइमेट चेंज में बदलाव हो सकता है

मानव गतिविधियों से वातावरण में इतनी ज्यादा ग्रीनहाउस गैसें छोड़ी गई हैं कि अगर सभी उत्सर्जनों को छोड़ भी दिया जाए तो भी ये नाकाफी होगा। हमे हवा में से कार्बन दी ऑक्साइड को हटाने के तरीके खोजने होंगे और इस के लिए ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने होंगे। मौजूदा वनो की कटाईको रोकना होगा और साथ ही साथ नए पेड़ लगाने होंगे। जल वायु परिवर्तन काफी तेजी से होता है जबकि एक बीज को पूर्ण रूप से वृक्ष बनने में काफी लम्बा समय लगता है।