कोरोना की वजह से 16 साल बाद भारत ने बदली अपनी ये रणनीति

16 साल बाद भारत ने विदेशी सहायता लेने की अपनी नीति में बड़ा बदलाव किया है। इस बदलाव के बाद भारत विदेश से मिलने वाले उपहार, दान और सहायता को स्वीकार करना शुरू कर दिया है.
16 साल पहले डा. मनमोहन सिंह की सरकार ने विदेशों से दान या सहायता न लेने का फैसला किया था। इससे पहले, भारत ने उत्तरकाशी भूकंप (1991), लातूर भूकंप (1993), गुजरात भूकंप (2001), बंगाल चक्रवात (2002) और बिहार बाढ़ (2004) के समय विदेशी सरकारों से सहायता स्वीकार की थी। इसके बाद इस पर रोक लगा दी गयी है. 16 साल बाद विदेशी सहायता हासिल करने के बारे में ये निर्णय नई दिल्ली की रणनीति में बदलाव है।
भारत ने अपनी रणनीति में दो बदलाव किये हैं. पहला ये कि मुसीबत की इसी घड़ी में भारत अनुदान या सहायता स्वीकार करेगा.. दूसरा कि चीन से भी मेडिकल से जुडी चीजे खरीदने में गुरेज नही करेगा,, इतना ही नही सरकार ने ये भी कहा है कि राज्य सरकारें अब सीधे विदेशों ने दवाएं खरीद सकती है.
दरअसल दिसंबर, 2004 में आई सुनामी के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा करते हुए कहा, ”हमारा मानना है कि हम खुद से इस स्थिति का सामना कर सकते हैं। यदि जरूरत पड़ी तो हम उनकी मदद लेंगे।” इसके बाद 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी और 2005 के कश्मीर भूकंप और 2014 की कश्मीर बाढ़ के समय भारत ने विदेशी सहायता लेने से साफ इनकार कर दिया। केरल में आई बाढ़ के बाद भी मोदी सरकार ने भी विदेशी सहायता लेने से इनकार कर दिया था
इस वक्त भारत की मदद करने के लिए करीब 20 देश आगे आये हैं अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, आयरलैंड, बेल्जियम, रोमानिया, लक्जमबर्ग, पुर्तगाल, स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया, भूटान, सिंगापुर, सऊदी अरब, हांगकांग, थाइलैंड, फिनलैंड, स्विटजरलैंड, नार्वे, इटली और यूएई कोरोना से लड़ाई के लिए अपनी सहायात भारत को अभेज रहे हैं.