International Womens Day : आख़िरकार भारत में ही महिलाओं के साथ ऐसा क्यों होता है?

पूरा विश्व आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है. आज के ये दिन महिलाओं को समर्पित है. भारत में महिलायें अब पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है कई क्षेत्रों में महिलायें पुरुषों से आगे निकल रही है लेकिन भारत में दुनिया के अन्य देशों की तुलना महिलाओं की स्थिति क्या है? आज हम इसी वीडियो में यही समझने की कोशिश करेंगे..

वर्ल्‍ड इकोनोमिक फोरम यानी विश्व आर्थिक मंच पर हर साल ही दुनिया में लैंगिक भेदभाव की सूची जारी की जाती है इसमें अलग अलग देशों में लैंगिक भेदभाव की स्थिति बताई जाती है.  साल 2020 में सामने आये आकड़ों के मुताबिक़ भारत ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स यानी लैंगिक भेदभाव की खाई के मामले में पिछले साल की तुलना में और नीचे पहुंच गया. जहां 2018 में अपने देश की रैंक 108 थी वो 2020 में गिर कर 112 पर आ गई. यह रैंक दुनिया के 153 देशों के बीच है.

ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में लैंगिक समानता नापने के लिए चार पैमाने इस्तेमाल किए जाते हैं..
वो चार पैमाने है इकोनोमिक पार्टीसिपेशन एंड ऑपरच्यूनिटी,
लैंगिक आधार पर शिक्षा तक पहुंच
हेल्थ एंड सरवाइवल यानी स्वास्थ्य और जीवन संभाव्यता
राजनीतिक सशक्तीकरण
आइये अब एक एक कर इन चारों पैमाने के बारे में जानते हैं और समझते है कि भारत की महिलायें इस आकड़े के अनुसार कहाँ खड़ी है?

इकोनोमिक पार्टीसिपेशन एंड ऑपरच्यूनिटी … इसमें यह देखा जाता है कि महिलाओं और पुरुषों के बीच वेतन और पद के मामले में कितना फर्क है,, महिलाओं के उच्च पदों पर पहुँचने की स्थिति क्या है… इस पहले पैमाने पर हमारी स्थिति बेहद चिंतनीय है. इस मामले में 153 देशों के बीच भारत की रैंक 149 है.

लैंगिक आधार पर शिक्षा तक पहुंच– भारत में कुछ वक्त पहले तक बच्चियों और महिलाओं पर बड़ी पाबंदियां थी.. यहाँ तक की उनका स्कूल कॉलेज पढ़ाई लिखाई सब ना के बराबर होता था लेकिन आज इसमें बदलाव दिखाई देती है फिर भी  इस मामले में हम 112वें नंबर पर हैं 153 देशों के बीच.. इसी से पता चलता है कि अभी भी देश में लड़कों की तुलना में लड़कियों के लिए शिक्षा तक पहुंचने के मौके कितने कम हैं. आंकड़ों की बात करे तो देश में आज जहां 82 फीसद पुरुष साक्षर हैं वहां सिर्फ 66 फीसद महिलाएं ही साक्षर हैं.

हेल्थ एंड सरवाइवल यानी स्वास्थ्य और जीवन संभाव्यता–  इस मामले में भारत की स्थिति बेहद खराब है.. इसका अंदाजा इसी बात से लगा लीजिये 153 देशों की सूची में भारत 150वे स्थान पर है. ये आंकड़े तब सामने आये हैं जब भारत में स्वास्थ्य में खासा जोर दिया जा रहा है.. ग्रामीण क्षेत्रों पर भी फोकस किया जा रहा है.

राजनीतिक सशक्तीकरण-  राजनीतिक सशक्तिकरण में महिलाओं की स्थिति काफी ठीक ठाक है. इसमें देखा जाता है कि राजनीतिक क्षेत्र में नीति निर्धारण में महिलाओं की भागीदारी कितनी है. इस मामले में हम 153 के बीच 18वें नंबर पर हैं. मतलब महिलायें राजनीति में काफी सक्रिय है और उन्हें सफलता भी मिल रही है.  यहाँ उनके साथ भेदभाद ने के मुकाबले में कम हो रहा है.
ये तो रही बात दुनिया के 153 देशों में बीच भारत के महिलाओं की स्थिति… अब बात करते है भारत में महिला सुरक्षा!

LocalCircles के एक सर्वे में बताया गया है कि लगभग 29 फीसदी भारतीय महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर छेड़छाड़ या यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है. इनमें से 75 फीसदी से अधिक ने पुलिस शिकायत दर्ज नहीं की.

एक सामुदायिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोकल सर्कल ने इस सर्वे को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2021 के अवसर पर जारी किया गया है. सर्वे के निष्कर्षों के अनुसार ट्रेन, स्टेशन, सार्वजनिक समारोह और सड़क वह अधिकतर स्थान हैं जहां भारतीय महिलाओं को छेड़छाड़ या यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है.

अब एनसीआरबी के आकड़ों पर गौर करते है.. आकड़ों के अनुसार वर्ष 2015 में देश में महिला अपराध के 3 लाख 29 हजार 243, वर्ष 2016 में 3 लाख 38 हजार 954 तथा 2017 में 3लाख 59 हजार 849 मामले दर्ज किए गए। इनमें हत्या, दुष्कर्म, एसिड अटैक, क्रूरता तथा अपहरण के मामले शामिल हैं। वर्ष 2017 में देश में महिलाओं के साथ दुष्कर्म की 32 हजार 559 तथा 2018 में 33हजार 356 घटनाएं दर्ज की गई। वर्ष 2019 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4 लाख 05हजार 861 मामले सामने आए थे, जिनमें प्रतिदिन औसतन 87 मामले बलात्कार के दर्ज किए गए। रिपोर्ट के अनुसार देशभर में वर्ष 2018 के मुकाबले 2019 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में 7.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। चिंता की बात यह है कि महिला अपराधों के मामलों में साल दर साल स्थिति बदतर होती जा रही है और अपराधियों को सजा मिलने की दर बेहद कम है।

लिंक्डइन ऑपर्च्युनिटी इंडेक्स 2021 रिपोर्ट की माने तो भारत में 85 फीसदी महिला कर्मचारियों से औरत होने के कारण वेतन वृद्धि, पदोन्नति और अन्य लाभ के मौके छिन गए. रिपोर्ट में कहा गया कि 10 में से 7 कामकाजी महिलाओं और खासकर मांओं को लगता है कि पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाना अक्सर उनके करियर को आगे बढने नहीं देता. सर्वे के इस रिपोर्ट में 37 फीसदी महिलाओं ने कहा कि उन्हें पुरूषों की तुलना में कम वेतन मिलता है.. चौकाने वाली बात तो ये है कि वेतन कम दिए जाने की बात को 21 फीसदी पुरूषों ने भी सही माना. इतना ही नहीं 5 में से एक महिलाएं अपने करियर में मिलने वाले अवसरों से नाखुश होने की वजह कंपनियों के रवैये को मानती हैं.

अब पूरा विश्व महिला दिवस तो मना रहा है लेकिन गौर करने वाली बात तो ये है कि महिलाओं के प्रति रवैये को अभी भी बुत ज्यादा बदलने की जरूरत है.. हालाँकि अब भारत की महिलायें हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है.. और पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलकर अपना योगदान दे रही है जरूरत है उन्हें सम्मान देने की उनके साथ भेदभाव ना करने की.