जगन्नाथ रथ यात्रा कब होगी शुरू? और क्यों १५ दिन एकांतवास में रहते है भगवान ?

भारत के चार पवित्र धामों में से एक है उड़ीसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर। जगन्नाथ भक्तों को हर साल षाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा का इंतजार रहता है। हिंदू धर्म में जगन्नाथ रथ यात्रा का बहुत महत्व है। भगवान जगन्नाथ को कृष्ण जी का ही अवतार माना जाता है। भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ तीन विशाल रथ पर सवार होते हैं।  तीनों भाई-बहन के रथ अलग-अलग होते हैं।  महाप्रभु जगन्नाथ जी अपने धाम से निकल कर गुंडिचा मंदिर जाते हैं, उसे उनकी मौसी का घर कहा जाता है. वहां पर भगवान जगन्नाथ सात दिनों तक रहते हैं। कहा जाता है कि इस रथ यात्रा में शामिल होने से मृत्यु के बाद मोक्ष मिलता है। इस रथ में शामिल होने के लिए लोग देश विदेश से यहां पहुंचते हैं। आइये जानते है इस साल कब है भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा और उस से जुड़े हुए महत्वपुर्ण बाते। 

रथ यात्रा के उत्सव की शुरुआत कब से होगी 

इस साल रथ यात्रा के उत्सव की शुरुआत 01 जुलाई 2022, दिन शुक्रवार से हो रही है। ढोल, नगाड़ों, तुरही और शंखध्वनि के बीच भक्तगण इन रथों को खींचते हैं। इस  रथ यात्रा का महत्व विश्न भर में है और यह दुनिया में भारत की सांस्कृतिक पहचान के तौर पर जानी जाती है। भगवान जगन्नाथ की यह रथ यात्रा हर साल आषाढ़ शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू होती है. इस बार द्वितीया तिथि का प्रारंभ 30 जून को सुबह 10:49 से हो रहा है. वहीं यह तिथि 1 जुलाई को दोपहर 01:09 तक रहेगी. हिंदू धर्म में किसी भी चीज का प्रारंभ उदया तिथि से माना जाता है. ऐसे में इस साल भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा 1 जुलाई यानी की शुक्रवार को शुरू होगी। 

15 दिन का एकांतवास क्यों?

यह एक पुराणिक मान्यता है की भगवान ने जब पूर्णिमा के दिन ठन्डे जल से स्नान किया था तो वे बीमार हो जाये थे। १४ दिन एकांत में रहने के बाद १५ वे दिन दरसन दिए थे। तब से यह प्रक्रिया हर साल दोहराई जाती है। 

ज्येष्ठ पूर्णिमा 14 जून को थी. इस अवसर पर जगन्नाथ जी, बलभद्र जी और सुभद्रा जी ये तीनों 108 घड़ों के जल से स्नान करते हैं, इस स्नान को सहस्त्रधारा स्नान के नाम से जाना जाता है. 108 घड़ों के ठंडे जल स्नान के कारण जगन्नाथ जी, बलभद्र जी और सुभद्रा जी तीनों बीमार हो गए हैं. ऐसे में अब वे तीनों 14 दिनों तक एकांतवास में रहेंगे और एकांतवास के बाद वे अपने भक्तों को दर्शन देंगे. बता दें जब तक वे चतीनों एकांतवास में रहेंगे तब मंदिर के कपाट नहीं खुलेंगे। 

जानिए भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा से जुडी हुई कुछ महत्वपुर्ण बाते 
  • रथ यात्रा में सभी के अलग अलग रथ बनाये जाते है। सबसे आगे बलराम जी का रथ होता है , बीच में सुभद्रा का और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ होता है। 
  • तीनो रथो के बनने के बाद छर पहनरा नाम अनुष्ठान संपन्न किया जाता है। पूरी के राजा इन तीनो रथो की पूजा करते है और फिर सोने के झाड़ू से रथ मंडप और रास्ते को साफ करते हैं।
  • इन रथों का निर्माण श्रीमंदिर के बढ़ई ही करते हैं. इनको भोई सेवायतगण कहते हैं. 200 से अधिक बढ़ई मिलकर इन तीन रथों का निर्माण करते हैं। 
  • तीनो के रथ अलग अलग रंग के होते है। बलराम जी के रथ को तालध्वज कहा जाता है। उनके रथ का रंग लाल और हरा होता है। देवी सुभद्रा के रथ को दर्पदलन या पद्म रथ कहा जाता है। जिसका रंग काला या नीले रंग का होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष या गरुड़ध्वज कहते हैं जिसका रंग लाल या पीला होता है।
  • भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जी और सुभद्रा जी के रथों को मोटे मोटे रस्सों से खींचा जाता है, जिसमें शामिल होने के लिए देश दुनिया से भक्त आते हैं। 
यह मिलता है रथ यात्रा का  फल 

जो व्यक्ति इस रथ यात्रा में शामिल होकर भगवान के रथ को खींचते है उसे 100 यज्ञ करने के फल मिलता है। साथ ही इस यात्रा में शामिल होने वाले को मोक्ष प्राप्त होता है। पुराणों के अनुसार, आषाढ़ मास से पुरी तीर्थ में स्नान करने से सभी तीर्थों के दर्शन करने जितना पुण्य मिलता है।