300 नही बल्कि 30 साल में बन जायेंगे जंगल ! जानिये क्या है मियावाकी पद्धति

विकास की दौड़ में जंगलों की कटाई अब आम बात हो चुकी है. पेड़ों की कटाई से पर्यावरण को बड़ा नुकसान पहुँचता है लेकिन मियावाकी ऐसी पद्धति है जिससे नए जंगल कम समय में तैयार किये जा सकते हैं..
आखिर क्या है मियावाकी पद्धति? .. आइये जानते है

एक रिपोर्ट में ये बात सामने आई थी कि अगर जलवायु परिवर्तन के खतरे से बचना है तो पृथ्वीवासियों को कम से कम एक लाख करोड़ (एक ट्रिलियन) पेड़ लगाने होंगे। इसे सफल बनने में बेहद कारगार मानी जा रही है जापान से निकली जंगल उगाने की \’मियावाकी\’ तकनीक। मियावाकी पद्धति जापानी वनस्पति  वैज्ञानिक डॉ. अकीरा मियावाकी ने तैयार की। कम समय में बेहतर प्राकृतिक वन उगाये जा सकते हैं।

इस विधि से देशी प्रजाति के पौधे एक-दूसरे के पास लगाए जाते हैं, जो कम जगह घेरने के साथ दूसरे पौधों की वृद्धि में सहायक होते हैं.. पौधे नजदीक होने से सूर्य की रोशनी को धरती पर नही पहुँच पाती जिससे जमीन पर उस जगह खर-पतवार नहीं उग पाते हैं। ख़ास बात ये है कि तीन साल के बाद इन पौधों की देखभाल की भी जरूरत नहीं पड़ती है। जबकि सामान्य पद्धति से पौधे लगाने पर पांच साल तक देखभाल की जरूरत पड़ती है। इतना ही नही मियावाकी पद्धति से लगाए गए पौधों की वृद्धि 10 गुना तेजी से होती है और सामान्य स्थिति से 30 गुना ज्यादा सघन होते हैं। इसके माध्यम से बहुत कम समय में जंगलों को घने जंगलों में बदला जा सकता है। वैसे जंगलों को पारंपरिक विधि से उगने में 200 से 300 वर्ष लगते हैं लेकिन इस पद्धति से सिर्फ 20 से 30 साल में ही जंगल उगाए जा सकते हैं। इस पद्धति से पौधे लगाने के लिए ख़ास पेड़ों की पहचान की जाती है। फिर झाड़ी, कैनोपी, छोटे और बड़े पेड़ में विभाजित किया जाता है.

-इस तकनीक की मदद से 2 फीट चौड़ी और 30 फीट पट्टी में 100 से भी अधिक पौधे रोपे जा सकते हैं।
-बहुत कम खर्च में पौधे को 10 गुना तेजी से उगाने के साथ 30 गुना ज्यादा घना बनाया जा सकता है।
पौधों को पास-पास लगाने से इन पर खराब मौसम का असर नहीं पड़ता है और गर्मी में नमी नहीं कम होती और ये हरे-भरे रहते हैं।
पौधों की बढ़त दोगुनी तेजी से होती है और 3 साल के बाद इनकी देखभाल नहीं करनी पड़ती।
कम जगह में लगे घने पौधे ऑक्सीजन बैंक की तरह काम करते हैं। इस तकनीक का इस्तेमाल वन क्षेत्र में ही नहीं घरों के आसपास भी किया जा सकता है।

इस तकनीक का उपयोग भारत में भी शुरू हो चुका है.. दिल्ली में इस तकनीक का इस्तेमाल अभी छोटे पैमाने पर हो रहा है लेकिन उत्तराखंड में पहाड़ी इलाकों में सरकार द्वारा इस तकनीक से जंगल उगाने का प्रयोग बड़े पैमाने पर हो रहा है.