जानिये आखिर सनातनी धर्म का महापर्व क्यों माना जाता है छठ पूजा?

बिहार समेत देश के कोने कोने में छठ का महापर्व बडे ही धूमधाम से मनाया जा रहा है. छठ का यह महापर्व भगवान सूर्य, उषा, प्रकृति, जल और वायु को समर्पित है। वैसे तो आदिकाल से ही सूर्य की पूजा और उपासना संसार की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में अलग-अलग प्रकार से होती रही है क्योंकि सूर्य के बिना धरती पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। हालाँकि सच्चाई तो ये भी है कि छठ का ये पर्व बिहार, बिहार से अलग होकर बने झारखंड और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन अब ये पर्व सभी सीमाओं को तोड़ते हुए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मनाया जाने लगा है.


छठ महापर्व की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसी विशेष देवता या भगवान की पूजा नहीं होती। न ही इस पूजा के लिए किसी मंदिर या पुजारी की जरूरत पड़ती है। इस महापर्व में सिर्फ व्रती होते हैं और प्रकृति होती है। इस व्रत में, व्रती तीन दिनों तक अन्न और जल का त्याग करते है और स्त्री और पुरुष, दोनों ही यह व्रत कर सकते हैं।

छठ पूजा को लेकर हम ऐसा भी कह सकते हैं सनातनी धर्म में सिर्फ छठ ही एक ऐसी पूजा है जो पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है. मिट्टी के चूल्हे पर प्रसाद बनाना, गेहूं को पीसकर बनाया गया ठेकुआ हो, कसार, गुड़ और चावल का बना खीर हो, गन्ना, टाव, नींबू, नारियल, सरीफा, शकरकंद, केला, पानी फल, बांस निर्मित सूप-टोकरी और सुमधुर लोकगीत हो इस पर्व में एक-एक चीज पूरी तरह से प्रकृति से जुड़ी हुई है शायद इसीलिए इसलिए तो छठ के इस पर्व को सनातनी परंपरा का महापर्व भी कहा जाता है।

छठ माता को बच्चों की रक्षा करने वाली देवी माना गया है. इस व्रत को करने से संतान को लंबी आयु का वरदान मिलता है.मार्कण्डेय पुराण में  इस बात का उल्लेख मिलता है कि प्रकृति ने अपने आप को छह भागों में विभाजित किया है. इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृ देवी के रूप में जाना जाता है, जो ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं. यह भी माना ये भी जाता है कि देवी दुर्गा का छठवां रूप कात्यायनी ही छठ मैया हैं. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इन्हीं देवी की पूजा की जाती है.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सायंकाल में सूर्य अपनी पत्नी प्रत्यूषा के साथ रहते हैं. इसलिए छठ पूजा में शाम के समय सूर्य की अंतिम किरण प्रत्यूषा को अर्घ्य देकर उनकी उपासना की जाती है. कहा जाता है कि इससे व्रत रखने वाली महिलाओं को दोहरा लाभ मिलता है. जो लोग डूबते सूर्य की उपासना करते हैं, उन्हें उगते सूर्य की भी उपासना जरूर करनी चाहिए. ज्योतिषियों का कहना है कि ढलते सूर्य को अर्घ्य देकर कई मुसीबतों से छुटकारा पाया जा सकता है. इसके अलावा इससे सेहत से जुड़ी भी कई समस्याएं दूर होती हैं. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के मुताबिक ढलते सूर्य को अर्घ्य देने से आंखों की रोशनी बढ़ती है.

आप सभी को छठ महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं