हरिद्वार में शुरू हो गया कुम्भ, पहुँचने लगे नागा साधू, पढ़िए उनकी रहस्यमयी दुनिया के बारे में

हरिद्वार में कुम्भ से पहले ही नागा साधू पहुँचने लगे हैं… इन नागा साधूओं की जिन्दगी बेहद रहस्यमयी होती है… कुम्भ के सबसे बड़े आकर्षक भी ये नागा साधू होते हैं… तो चलिए आज बात करते हैं नागा साधूओं के रहस्यमयी दुनिया की…
आगे बढ़ने से पहले आपको बता दें कि कुंभ 12 साल बाद होता है लेकिन ग्रहों की स्थिति के चलते ये इस बार एक साल पहले ही हो रहा है.. कुंभ मेले के इतिहास में पहली बार हरिद्वार में यह 12 साल की बजाए 11वें साल में आयोजित होगा. 2022 में लगने वाला कुंभ मेला इस साल हरिद्वार में होने वाला है, क्योंकि ग्रह-गोचर चल रहे हैं.14 जनवरी से हरिद्वार का कुभ शुरू हो चुका है और इस कुम्भ मेले में शामिल होने के लिए नागा साधू या नागा बाबा पहुँचने लगे हैं… हालाँकि पूरे दल-बल के साथ शाही स्नान के दौरान नजर आएंगे, जो 11 मार्च को होगा.

अव बात करते हैं नागा साधुओं की… नागा साधू बनना आसान नही होता है.. इसके लिए कठोर तप, तपस्या और त्याग करना पड़ता है… कोई व्यक्ति साधु बनने के लिए किसी अखाड़े में जाता है, तो उसे कभी सीधे-सीधे अखाड़े में शामिल नहीं किया जाता. अखाड़ा अपने स्तर पर ये तहकीकात करता है कि वह साधु क्यों बनना चाहता है? उस व्यक्ति की तथा उसके परिवार की संपूर्ण पृष्ठभूमि देखी जाती है. अखाड़े में प्रवेश के बाद उसके ब्रह्मचर्य की परीक्षा ली जाती है. जिसमें तप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, ध्यान, संन्यास और धर्म का अनुशासन तथा निष्ठा परखी जाती है. इसके बाद एक एक चरण आगे बढ़ते बढ़ते नागा साधुओं में ही पदवी दी जाती है.

आदिगुरु शंकराचार्य को लगने लगा था सामाजिक उथल-पुथल के युग में केवल आध्यात्मिक शक्ति से ही इन चुनौतियों का मुकाबला करना काफी नहीं है. उन्होंने जोर दिया कि युवा साधु व्यायाम करके अपने शरीर को सुदृढ़ बनायें और हथियार चलाने में भी कुशलता हासिल करें. इसलिए ऐसे मठ बने जहां इस तरह के व्यायाम या शस्त्र संचालन का अभ्यास कराया जाता था, ऐसे मठों को अखाड़ा कहा जाने लगा. प्राचीन काल में नागा साधू युद्ध कलाओं में निपुड़ होते थे. यहां तक कि स्थानीय राजा-महाराज विदेशी आक्रमण की स्थिति में नागा योद्धा साधुओं का सहयोग लिया करते थे जिसका वर्णन इतिहास में भी मिलता है..

श्री निरंजनी अखाड़ा, श्री जूनादत्त या जूना अखाड़ा, श्री महानिर्वाण अखाड़ा, श्री अटल अखाड़ा, श्री आह्वान अखाड़ा, श्री आनंद अखाड़ा, श्री पंचाग्नि अखाड़ा, श्री नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा, श्री वैष्णव अखाड़ा, श्री उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा, श्री उदासीन नया अखाड़ा, श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा और निर्मोही अखाड़ा ये कुछ प्रमुख अखाड़े हैं.

नागा साधुओं के बारे में कहा जाता है कि वे कुम्भ में कब और कैसे पहुँचते हैं ये कोई जान नही पाता…अक्सर ये जंगल के रस्ते से सफ़र करते हैं.  कहते हैं कि ये यात्रा में केवल कंदमूल, जड़ी-बूटियों, फल-पत्तियों का ही सेवन करते हैं, जो ये जंगल से ही प्राप्त कर लेते हैं।

माना जाता है कि अपनी यात्रा के दौरान नागा साधु सोते भी नहीं हैं, जब तक जरुरी न हो। और, यदि सोते भी हैं, वो भी जमीन पर, बिना किसी प्रकार के कृत्रिम बिस्तर के।

नागा साधुओं की जिन्दगी इतनी रहस्यमयी है कि हम कुछ मिनट के वीडियो में उनके जीवन के बारे में नही बता सकते.. या फिर उनकी दुनिया ऐसी है कि सबकुछ नही बता सकते कि आख़िरकार उनका पूरा जीवन कैसा है? लेकिन इतना जरूर बता सकते हैं कि साल 2021 के कुम्भ की शुरुवात हो चुकी है.. इस साल कुंभ मेले के दौरान 4 शाही स्नान होंगे और इसमें 13 अखाड़े भाग लेंगे. इन अखाड़ों से झांकी निकाली जाएंगी. इस झांकी में सबसे आगे नागा बाबा होंगे और महंत, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर नागा बाबाओं का अनुसरण करेंगे.