न्यूजीलैंड: 8 घंटे में आए तीन बड़े भूकंप, हिल गया पूरा देश

न्यूजीलैंड 4 मार्च यानी गुरुवार दोपहर 8 घंटे में तीन बड़े भूंकप आए.. पहला भूकंप 7.3 तीव्रता का आया. दूसरा भूकंप 7.4 तीव्रता का था. उसके बाद 8.1 तीव्रता के भूंकप से धरती कांपी तीनों की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि बड़ा नुकसान हो सकता था, लेकिन फिलहाल किसी के हताहत होने की खबर नहीं है… ऐसा हुआ कैसे यही इस वीडियो में जानेंगे.. आग बढ़ने से पहले.. आपको बता दें कि ………

दरअसल न्यूजीलैंड में सबसे बड़ा भूकंप साल 2011 की फरवरी में आया था. क्राइस्टचर्च शहर में आए भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 6.3 थी और इसकी गहराई जमीन से बस 5 किलोमीटर रही होगी. ये भूकंप का झटका इतना शक्तिशाली था कि शहर की लगभग सारी इमारतें टूटफूट गईं और लगभग 1,240 घरों की नींव इतनी कमजोर हो गईं कि उन्हें तोड़ना  पड़ा. हादसे में 185 लोगों की मौत हो गई थी.

इसी घटना के बाद न्यूजीलैंड ने भूकंप से निपटने के लिए प्लान बनाना शुरू कर दिया था..और क्राइस्टचर्च को दोबारा बनाने में  40 मिलियन डॉलर की राशि इमारतों के निर्माण पर लगी. कहा जता है उस वक्त भूकंप ने जो नुकसान किया था उसकी भरपाई करने में 50 से 100 साल भी लग सकते हैं.

दरअसल पैसिफिक प्लेट और ऑस्ट्रेलिया-इंडिया प्लेट की टेक्टोनिक प्लेट जहाँ मिलती हैं वहीँ पर न्यूजीलैंड बसा हुआ है. इसी वजह से भूकंप का खतरा हमेशा बना रहता है और ये खतरा सिर्फ क्राइस्टचर्च शहर पर नहीं, बल्कि पूरे देश पर था. यही देखते हुए न्यूजीलैंड में नये तरीके से भूकंपरोधी मकानों का निर्माण शुरू हुआ. यहाँ तक कि चर्च को तोड़कर भी उन्हें फिर से भूकम्परोधी बनाया गया जो रिक्टर स्केल पर 7 तीव्रता वाले भूकंप को झेल सकती है. न्यूजीलैंड की संसद भी भूकम्परोधी फॉर्मूला पर बनाई गई. अब यहां जो भी इमारतें बन रही हैं, वो कड़े सुरक्षा मानकों के आधार पर तैयार हो रही हैं ताकि आने वाले समय में कभी क्राइस्टचर्च हादसा न दोहराया जाए.

नये साल की शुरुआत में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल हाउसिंग टेक्नोलॉजी चैलेंज इंडिया (GHTC-India) के तहत देश के छह राज्यों में लाइट हाउस प्रोजेक्ट की बात की. इसके तहत राज्यों के चुनिंदा शहरों में भूकंपरोधी हल्के मकान बनाए जाएंगे. इसके लिए न्यूजीलैंड से प्रेरित होने की भी बात हुई कि उस देश ने अपने यहां भूकंपरोधी संसद से लेकर आम इमारतें बना रखी हैं.
अगर सिर्फ दिल्ली की बात करें तो आपको जानकारी हैरानी कि अनुमान के मुताबिक़ दिल्ली की 70-80% इमारतें भूकंप का औसत से बड़ा झटका झेलने के लिहाज़ से डिज़ाइन ही नहीं की गई हैं. ऐसे में भूकंप के तगड़े झटके दिल्ली सह नही पाएगी.. दिल्ली ही नही बल्कि दिल्ली से स्टे कई शहर हैं तो भूकंप के थोड़े तेज झटके नही झेल पायेंगे… क्योंकि यहाँ की इमारतें भूकंप रोधी तरीके से नही बनायी गयी हैं यहाँ तक जो मानक होते हैं उनका भी सही तरीके से ध्यान नही दिया गया है.

दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में पिछले 300 वर्षों के भूकंप इतिहास देखा जाए तो सबसे ज़्यादा तबाही मचाने वाला भूकंप 15 जुलाई, 1720 का बताया जाता है. ‘सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ की अनुमिता रॉय चौधरी का भी मानना है कि दिल्ली में हज़ारों ऐसी इमारतें हैं जिनमें रेट्रोफ़िटिंग यानी भूकंप निरोधी मरम्मत की सख़्त ज़रूरत है.उन्होंने कहा, “भारत के कई हिस्सों से इमारतों के ज़मीन में धसने की ख़बरें आती रहती हैं और वो भी बिना भूकंप के. अब चूँकि दिल्ली-एनसीआर का इलाक़ा पहले से ही यमुना नदी के दोआब पर फैलता गया है तो ज़ाहिर है बड़े भूकंप को झेल पाने की क्षमता भी कम होगी. ज़रूरत पुरानी इमारतों की पूरी मरम्मत करके, सभी नई इमारतों को कम से कम 7.0 रिक्टर स्केल की तीव्रता वाले भूकंप को झेलने वाला बनाने की है.”