रिपोर्ट : एनसीआरबी की डाटा से सामने आये खतरनाक आकड़े, देखिये भारतीय जेलों की दयनीय स्थिति

एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट  भारतीय जेलों की हकीकत बयान कर रही है.. इसी रिपोर्ट के जरिये देश के गरीबों और दलितों की खराब हालत भी सामने आई है,

एनसीआरबी की 2020 की रिपोर्ट कहती है कि देश में 1 लाख 44 हजार 125 सजा भुगत रहे कैदी हैं जबकि अंडरट्रायल यानी विचाराधीन कैदियों की संख्या 3 लाख 30 हजार 487 है। 2011 की जनगणना के मुताबिक़ देश में एससी वर्ग 16.63  प्रतिशत है. लेकिन जेलों में दोषी करार दिए जाने के बाद सज़ा भुगतने वाले लोगों में उनकी हिस्सेदारी 21.7 फीसदी है। इसी तरह अंडरट्रायल या विचाराधीन कैदियों में उनका हिस्सा 20.9 प्रतिशत है. वहीँ देश की आबादी में एसटी वर्ग की जनसंख्या 8.6 फीसदी है और ।हालांकि सज़ायाफ्ता कैदियों में उनकी हिस्सेदारी आबादी 6.7 प्रतिशत है जबकि अंडरट्रायल कैदियों में यह उससे कहीं ज्यादा 10.52 प्रतिशत है। और देश में मुसलमानों की आबादी 14.2 प्रतिशत हैं जबकि सज़ा भुगत रहे कैदियों में 16.6 फीसदी मुसलमान हैं जबकि बगैर दोष सिद्ध हुए अंडरट्रायल कैदियों में उनकी हिस्सेदारी 18.73 प्रतिशत है।

वहीँ अगर बात महिला कैदियों की जाए तो देश में 1543 महिला कैदी ऐसी हैं जो अपने 1779 बच्चों के साथ जेल में बंद हैं। इनमें से 1212 तो विचाराधीन हैं और उनके साथ 1409 बच्चे हैं। जबकि, 325 सजायाफ्ता हैं और उनके साथ 363 बच्चे हैं। यूपी में सबसे ज्यादा ऐसे मामले हैं। यहां 430 महिलाएं हैं जिनके साथ 490 बच्चे जेलों का जीवन जीने को मजबूर हैं। दूसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल है जहां 147 महिलाएं अपने 192 बच्चों के साथ जेल में हैं। और, फिर मध्य प्रदेश का नंबर आता है, जहां 138 महिलाएं अपने 177 बच्चों के साथ जेल में बंद हैं।

साल 2014 से 2019 के बीच अंडरट्रायल कैदियों की संख्या में 20 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। वहीं, सजा भुगत रहे कैदियों में करीब 9.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जबकि पिछले पांच सालों में कुल कैदियों की तादाद में 14.35 प्रतिशत का इजाफा हुआ है.

वहीँ देश में देश में जितने दोषी सज़ा भुगत रहे हैं उसके करीब ढाई गुणा कैदी अंडरट्रायल हैं यानी विचाराधीन है. मतलब इन कैदियों की सुनवाई ही नही पूरी हुई है और वे सजा भुगत रहे हैं. इतना ही नही जेल में कैदियों को जानवारों की ठूस कर रखा गया है इसका भी खुलासा एनसीआरबी की रिपोर्ट से होताहै. एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक़ देश की 1350 जेलों में 4 लाख 3 हजार 739 कैदियों की क्षमता है। मगर, कैदी हैं 4 लाख 78 हजार 600। यानी क्षमता से 118.5 फीसदी ज्यादा कैदी जेलों में बंद हैं। जिन राज्यों की जेलों में क्षमता से अधिक कैदी भरे गये हैं इनमें दिल्ली में क्षमता से 174.9% ज्यादा कैदी हैं। दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश में 174.9% ज्यादा और फिर उत्तराखण्ड (159%), मेघालय (157.4%), मध्य प्रदेश (155.3%), सिक्किम (153.8%), महाराष्ट्र (152.7%), छत्तीसगढ़ (150.1%) और जम्मू-कश्मीर में (126.8%) ज्यादा कैदी हैं.

इन आकड़ों में गौर करें तो ये पता चलता है कि हमारे देश में अभी भी कानूनी प्रक्रिया कितनी धीमी है लचर है.. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि इन आकड़ों से भारत की आपराधिक न्याय पद्धति की बहुत सी कमजोरियों का पता चलता है और ये भी कि गरीब व्यक्ति के लिए इंसाफ की लड़ाई कितनी कठिन है। जिन्हें अच्छे और महंगे वकील मिल जाते हैं उनकी जमानत आसानी से हो जाती है। बहुत मामूली से अपराधों के लिए भी गरीब लोग जेल में सड़ने को विवश हैं। वहीँ मानवाधिकार से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि जेलों की चरमराई व्यवस्था के बीच जेलों में कैदियों की पिटाई और उनकी मौतों के मामले भी चिंताजनक है.