एक अकेले व्यक्ति ने लगा दिया पूरा हरा भरा जंगल, लोग कहते हैं ‘जंगली’

पद्म पुरस्कार से सम्मानित जादव पायेंग के बारे में कई लोगों ने सुना होगा, जयादातर जिन्हे लोग “असम के वन पुरुष” के रूप में  भी जानते है। इन्होने अकेले ही  ब्रह्मपुत्र के एक रेत द्वीप के 11,000 एकड़ से अधिक को हरे भरे जंगल में बदल दिया है। लेकिन आप को यह जानकर हैरानी होगी की यह ऐसा करने वाले अकेले व्यक्ति नहीं है।  इन्ही के जैसा अद्भुत कारनामा उत्तराखंड के एक पूर्व सैनिक, जगत सिंह ने भी कर दिखाया है, जिन्हे वह के लोग प्यार से “जंगली जी ” कहते है। इन्होने भी अकेले अपने दम पर करीब 7 एकड़ की जमीन पर एक पूरा हरा भरा जंगल उगा दिया है।

कैसे मिली प्रेरणा

उत्तराखंड के किसी भी आम नौजवान की तरह जगत सिंह चौधरी जब जवान हुए तो बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स की नौकरी करने लगे ,लेकिन वे जब भी छुटियो में अपने गांव आते थे तो उन्हें इस बात से बहुत तकलीफ होती थी।  उनकी गांव की महिलाये जानवरो के चारे और  जलावन  के लिए 10 से 15 किलोमीटर दूर जंगलों में जाती थीं। जायदातर महिलाये सुबह से जा कर शाम को ही घर लौट पाती थी। इस बीच कुछ महिलाओ पर जंगली जानवर हमला भी कर देते थे और कुछ महिलाओ की मौत भी हो जाती थी। अपने गांव की महिलाओ की इस तकलीफ को देखकर जगत सिंह बहुत दुखी होते थे।

सुझा अनोखा उपाए

अपने गांव की महिलाओ की परेशानी को देखकर जगत सिंह को एक उपाए सुझा। उन्होंने अपने पुस्तैनी  खाली और बंजर और पड़ी हुई पहाड़ी जमीन पर जंगल उगने का सोचा। यह जमीन ढालू थी, जिसमें पानी नहीं रुकता था। जगत सिंह ने जमीन में चारे और जलावन के लिए पेड़ लगाए। इसके बाद वे जब भी छुट्टियों में घर आते तो इसी जमीन में पेड़ लगाते थे। धीरे धीरे जगत सिंह साल में २ बार छुट्टियों में घर आने लगे और पेड़ों की देखभाल करने लगे। साल 1980 में रिटायर होने के बाद जगत सिंह ने अपना पूरा जीवन इसी जंगल को समर्पित कर दिया। वे गड्ढे बनाते, खाई खोदते और पेड़ों की देखरेख करते थे और सिचाई के लिए ३ km  दूर से पानी लाते थे।

सरकारी अधिकारियों ने अपनाया मॉडल

डॉ. आर.एस. टोलिया जो उस समय के उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव (उत्तरांचल) थे 10 दिनों के अंदर ही उनके घर पहुंच गए और उनके उगाये हुए जंगल का निरीक्षण किया। कृषि विभाग, वन विभाग और सभी जिला अधिकारियों को पत्र लिखकर ‘जंगली’ के मॉडल को देखने और बरसात से पहले उसके आधार पर वृक्षारोपण के प्रोजेक्ट बनाने के निर्देश दिए।

जंगल में शुरू की प्राकृतिक खेती

साल 1990 में ही जगत सिंह ‘जंगली’ ने उन पेड़ों के बीच प्राकृतिक खेती की शुरुआत करि थी। उन्होंने हल्दी, अदरक, इलायची जैसे मसाले और सब्जियां वहां पर उगाना शुरू कर दिया। गल लगाने का परिणाम यह हुआ कि उस बंजर जमीन में पत्तियों के गिरने के कारण ह्यूमस और कॉर्बन बढ़ने लगा। जगत सिंह ने अपने जंगल में अनेको जड़ी बूटी उगा राखी है। लेकिन साल 2002  से पहले उत्त्तराखंड में जड़ी बूटी बेचने पर प्रतिबन्ध था। साल २००२ में जब उत्तराखंड के राज्यपाल उनका जंगल देखने आए तो उन्होंने आग्रह किया की आप जड़ी बूटी उगने और बेचने पर से प्रतिबन्ध हटा दे। इस पर फौरन सरकार ने कदम उठाया और अब उत्तराखंड में जड़ी-बूटियों को उगाने और बेचने को कोई प्रतिबंध नहीं है. उनकी इस पहल से वह के छोटे किसानों को लाभ हुआ।

बंजर जमीन से फूटा पानी का सोता

आज 40 साल बाद जगत सिंह के लगाए हुए पेड़ों की जड़ें इतनी मजबूत हो गई हैं कि वे मिट्टी और पानी को रोक लेती हैं। करीब 40  साल बाद बंजर पड़ी उस जमीन से आज पानी का सोता फूट रहा है. जिससे जगत सिंह के साथ ही उनके गांव के लोग भी लाभ उठा रहे हैं. उनके सोते के बहते पानी को गांव में नीचे रोकने के लिए सरकार ने टैंक बनवाया है।

पर्यापरण और रोजगार दोनों जरूरी

जगत सिंह ‘जंगली’ का कहना है कि पर्यावरण बचाने के साथ-साथ रोजगार की व्यवस्था करना भी जरूरी है। जंगली’ का मानना है कि पेड़ लगाना आसान है. जबकि उन्हें 10 साल तक बच्चे की तरफ पाल-पोस कर जिंदा रखना कठिन है। उनके अनुसार ऐसे पेड़ लगाए जाने चाहिए, जिनसे रोजगार भी मिले। अगर इंसान प्रकृति की सेवा करेंगे तो उसका आशीर्वाद जरूर मिलेगा। करोड़ों इंसानों की आजीविका जल, जंगल और जमीन से जुड़ी है और उसकी सुरक्षा जरूरी है।