163 साल तक बिना टॉयलेट के ही ट्रेन चलाते रहे रेल ड्राईवर, 2016 में मिली ये ख़ास सुविधा

आपको आज ट्रेन में सफ़र वक्त करते समय कई सारी सुविधाएं मिलती है.  इनमें  से एक महत्वपूर्ण सुविधा टॉयलेट की होती है. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि कई सालों तक ट्रेन के कोच में टॉयलेट हुआ ही नही करता था.

भारतीय रेल इतिहास की पहले ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को बॉम्बे से ठाणे के बीच चलाई गई थी और ट्रेन में यात्रियों के लिए पहली बार साल 1909 में टॉयलेट की सुविधा उपलब्ध कराई गई थी.

शुरुआत में सिर्फ फर्स्ट क्लास ट्रेन के यात्रियों को ही टॉयलेट की सुविधा मिलनी शुरू हुई थी धीरे-धीरे सभी श्रेणी के यात्रियों के लिए ट्रेनों में टॉयलेट बना दिए गए. लेकिन जिस ट्रेन से हम चलते हैं उसके चालाक यानि कि लोको पायलट की स्थिति इस मामले में अच्छी नही थी.  ट्रेन चलाने वाले ड्राइवर्स को पहले टॉयलेट जाने के लिए स्टेशन आने का इन्तजार करना पड़ता था. ज्यादा इमरजेंसी होने पर ट्रेन को बिना स्टेशन होल्ट के ही स्टेशन पर रोकना पड़ता था फिर ड्राईवर को जल्द से जल्द टॉयलेट जाकर वापस ट्रेन इंजन तक पहुंचना होता था.. आपको जानकार हैरानी होगी कि पहले ट्रेन लेट होने के पीछे एक कारण ये भी हुआ करता था लेकिन साल 2016 में ड्राइवर्स की मांग को जरूर समझते हुए ट्रेन इंजन में एक टॉयलेट बनाये की शुरुआत हुई.

दरअसल सुरक्षा कारणों से रैन के इंजन में टॉयलेट नही बनाये जा रहे थे लेकिन लंबे विचार-विमर्श और जांच-पड़ताल के बाद रेलवे ने साल 2016 से ट्रेन के इंजनों में टॉयलेट बनाने का काम शुरू कर दिया. आपको बता दें कि भारतीय रेल के इंजनों में बायो टॉयलेट लगाए जाते हैं ताकि गंदगी ट्रैक पर न गिरे. इसके अलावा इन टॉयलेट को इस तरह से डिजाइन किया गया है जिससे काफी कम पानी की खपत होती है. ट्रेन ड्राईवर के लिये टॉयलेट की सहूलियत उन वजहों में से एक हैं जिनकी वजह से आज ट्रेन पहले की अपेक्षा कर लेट होती है.  साल 2016 से पहले कई ट्रेनें ड्राइवरों के शौच की समस्या की वजह से लेट हो जाती थीं. हालांकि, ट्रेन के ड्राइवर अपनी क्षमता के अनुसार शौच के लिए घंटों तक इंतजार किया करते थे.