भारत की संस्कृती में पर्यावरण बचाने का विशेष महत्व!

पूरी दुनिया भौतिक विकास के पीछे भाग रही है, वो भी पर्यावरण और प्राकृतिक स्रोतों की सुरक्षा की परवाह किये बगैर.जिसकी वजह से आर्थिक विकास करना आत्मघातक साबित हो रहा है. कुछ वक्त पहले आई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार,हर साल करीब 70 लाख लोगों की मौत समय से पहले हो जाती है वो भी सिर्फ घर के अंदर और बाहर होने वाले वायु प्रदूषण की वजह से.इन लोगों में से 6 लाख बच्चे भी शामिल हैं. इस जानकारी को देखते हुए हम इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि पर्यावरण प्रदूषण किस तरह से हमारे स्वास्थ्य के लिए एक जहर बनता जा रहा है. आज हवा से लेकर पानी, फल सब्जियां यहां तक कि रोजमर्रा की सभी चीजें प्रदूषित हो गई हैं और कई तरह की बीमारियों का घर बन गई हैं. आज दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं बचा है जो पर्यावरण संकट को लेकर मंथन नहीं कर रहा हो.इसको लेकर भारत भी चिंतित है.लेकिन, जहां दूसरे देश भौतिक चकाचौंध के लिए अपना सबकुछ लुटा चुके हैं, वहीं भारत के पास आज भी बहुत कुछ है.

हालांकि पर्यावरण की हालात बदतर होने की समस्या विश्वव्यापी है, पर ऐसे अनेक देश हैं, जहां इसकी गंभीरता भयानक रूप लेती जा रही है. अगर बात पश्चिम के देशों की करें तो, इन देशों ने प्रकृति को हद से ज्यादा नुकसान पहुंचाया है. क्योंकि प्रकृति को नुकसान पहुंचाने से रोकने के लिए पश्चिम में मजबूत परंपराएं भी नहीं थीं. लेकिन भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण को बहुत महत्व दिया गया है. मानव और प्रकृति के बीच अटूट रिश्ता बनाया गया है. सनातन परम्पराओं में प्रकृति संरक्षण के बहुत सारे सूत्र मौजूद हैं. हिन्दू धर्म में प्रकृति पूजन को प्रकृति संरक्षण के तौर पर देखा गया है. यही वजह है कि भारत की आबादी का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी अपनी संस्कृति को पूज्यनीय और विश्वसनीय मानता है. हमारे देश में अनेक तीर्थ स्थानों को पवित्र और त्योहारों को मनाने की परम्परा आज भी कायम है. जहाँ हर दिन, सप्ताह, महीना, साल सांस्कृतिक मान्यताओं से भरपूर है, भारत में सभी दिन और त्योहार तीर्थ प्राकृतिक संसाधनों से सम्बन्धित है. भारत में पेड़, पौधों, पुष्पों, पहाड़, झरने, पशु-पक्षियों, जंगली-जानवरों, नदियाँ, सरोवन, वन, मिट्टी, घाटियों यहाँ तक कि पत्थर भी पूज्य हैं और उनके प्रति स्नेह और मानवीय रिश्ते आज भी कायम है. 

भारतीय संस्कृति में जहां पेड़ की तुलना पुत्र और पुत्री से की गई है तो वही नदी को मां का दर्जा दिया गया है. इतना ही नहीं ग्रह-नक्षत्र, पहाड़ और हवा देवरूप माने गए हैं. भारतीय मान्यताओं के मुताबिक़ जो व्यक्ति एक पीपल, एक नीम, दस इमली, तीन कैथ, तीन बेल, तीन आंवला और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह पुण्यात्मा होता है और कभी नरक के दर्शन नहीं करता. इसी तरह धर्म शास्त्रों में सभी तरह से वृक्ष सहित प्रकृति के सभी तत्वों के महत्व की वाखया की गई है. अगर हम भारतीय संस्कृति को देखे तो पता चलता है कि यहां पर्यावरण संरक्षण करने की ललक बहुत अतीत से ही मौजूदा था, बस उसका स्वरूप अलग था. उस वक्त में कोई राष्ट्रीय वन नीति या पर्यावरण पर काम करनेवाली कोई संस्थाएं नहीं थीं लेकिन पर्यावरण का संरक्षण हमारे दिनचर्या के कामों से ही जुड़ा हुआ था. तभी तो इतिहास को देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि ऋषि-मुनियों ने त्योहारों के द्वारा ही पर्यावरण को संरक्षित करने का तरीक़ा निकाला था.

यही कारण है कि भूतकाल से ही भारत में प्रकृति के साथ संतुलन करके चलने का महत्वपूर्ण संस्कार है. हिन्दू परंपराओं ने कहीं न कहीं प्रकृति का संरक्षण किया है. हिन्दू धर्म का प्रकृति के साथ कितना गहरा रिश्ता है, ये वो सारे पर्व बता देते है जिसमें लोग पेड़ से लेकर नदी तक की पूजा करते है और उन्हें संरक्षित-सुरक्षित करते है. हिंदू धर्म में पीपल और बरगद के पेड़ों को तो ब्राह्णण माना गया है. तुलसी का पौधा तो इतना पवित्र माना गया हैं कि हर भारतीय उसे घर में लगाता है. वैसाख में पीपल पूजा, कार्तिक में आँवला और तूलसी पूजा, कदम्ब के वृक्ष, केला जैसे कई पेड़ो को पूजने की परम्परा रही है.इन सब की पूजा आज भी अधिकांश घरों में की जाती है और यही वजह है कि घरों में लोगों ने तुलसी, केला और कई तरह के फुलों को लगाया है और उसकी देखभाल की जिम्मेदारी ली है. यहां तक की भारत में कई पेड़ों को औषधिय गुण के लिए भी जाना जाता है और इसी वजह से उनको संरक्षित किया जाता है. आज भी गांवों में नीम का पेड़ गाँव की चौपाल पर और पीपल का पेड़ गाँव के बाहर जलाशय के किनारे शोभायमान होता है.