कोरोना काल में बढ़ गया सिंगल यूज सामानों का प्रचलन, अब पर्यावरण पर टूटेगी आफत?

धरती में फ़ैल रहे प्रदुषण या फिर कचरे की मुख्य वजह प्लास्टिक है.. कोरोना काल के बाद से सिंगल यूज प्लास्टिक की माग और उपयोग में जबदस्त बढ़ोत्तरी देखने को मिली है.. मुंबई स्थित एक पर्यावरण संस्थान के अनुसार हाल में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु एवं पुणे में लगभग 45 प्रतिशत सिंगल यूज प्लास्टिक के प्रयोग में वृद्धि हुई है और इसमें  अगर और भी सिंगल यूज वाली सामग्रियों को भी जोड़ दिया जाए तो यह 50 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा..
कोरोना के कारण आजकल प्रतिदिन लगभग 600 टन तक बायो मेडिकल वेस्ट पैदा हो रहा है। सिंगल यूज वाले सामानों को कोरोना से सुरक्षा से जोड़ने वाली बात ने इसे और भी खतरनाक बना दिया है.. सिंगल युज प्लास्टिक या सामान का प्रचलन इसी बात से और बढ़ गया कि लोगों ने इसे सुरक्षित मान लिया है.. लेकिन ये अब बड़ी समस्या बन सकता है.

द वल्र्ड अकाउंट की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रतिदिन दुनिया में लगभग 10 करोड़ प्लास्टिक बोतल का इस्तेमाल होता है। एक फैक्ट तो ये भी है एक बोतल पानी की खरीद पर 90 फीसदी दाम आपको उसके पैंकिंग के लिए चुकानी पड़ती है..

वहीँ दुनिया में हर साल लगभग 30 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिनमें से 50 प्रतिशत सिंगल यूज वाले प्लास्टिक होते हैं। भारत के पर्यावरण मंत्रलय के अनुसार रोजाना करीब 20 हजार टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है जिसमें से केवल 13 से 14 हजार टन को ही एकत्रित किया जाता है। इनमें से ज्यादातरकचरे को नदियों के रास्ते समुद्रों में बहाए जा रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार समुद्र में वर्ष 2050 तक मछलियों से कहीं ज्यादा प्लास्टिक कचरा होगा। एक अनुमान के अनुसार इन कचरों के कारण प्रतिवर्ष लगभग एक लाख जलीय स्तनपाई एवं 10 लाख समुद्री पक्षियों को जान से हाथ धोना पड़ता है। प्रशांत महासागर में गार्बेज पैच की समस्या तो और भी भयावह होती जा रही है।

दैनिक जागरण में छपी एक रिपोर्ट की माने तो द वर्ल्‍ड अकाउंट के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में इस गार्बेज पैच का क्षेत्रफल 20 लाख वर्ग किमी से अधिक हो गया है। आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में लगभग 90 प्रतिशत प्लास्टिक अपशिष्ट को रीसाइकल नहीं किया जाता है.. जिसका नतीजा हमें वायु प्रदुषण और जल प्रदुषण के रूप में झेलना पड़ता है.. जगह-जगह पर कूड़ा जलाकर खत्म करने की प्रथा के कारण वातावरण में कार्बन, मिथेन आदि जैसे गैस द्वारा प्रदूषण होता है, जिसकी मार अभी दिल्ली व उत्तर भारत के कई शहर झेल रहे हैं।

दिल्ली समेत देश के कई राज्यों की हवा इतनी प्रदूषित हो हुकी है कि लगभग हर घर में मौजूद एक इंसान जरूर प्रदुषण से होनी वाली बीमारी से ग्रसित है… लेकिन क्या दिल्ली में फ़ैल रहे वायु प्रदुषण के लिए पराली ही जिम्मेदार है?  पराली की हिस्सेदारी तो लगभग 40 प्रतिशत के आस पास मानी जाती है लेकिन दिल्ली में प्रदुषण फैलने के पीछे दो मुख्य कारण है.. पहला धूलकण जिसकी हिस्सेदारी 45 प्रतिशत है और गाड़ियों से निकला हुआ धुआं 17 प्रतिशत भागीदारी के साथ दिल्ली प्रदूषण के मुख्य कारण हैं। इसके अलावा पेट्रो ईंधन की भागीदारी 16 प्रतिशत है.. वहीँ पिछले चार महीने में चार गुना से अधिक वाहन बिक्री में वृद्धि भी बढ़ते प्रदूषण के लिहाज से चिंताजनक है।

ऐसा नही है सरकार ने प्रदुषण की दिशा में कोई कदम नही उठाये हैं लेकिन सरकार द्वारा उठाये गये कदमों से राहत कितना मिली ये सोचने का विषय है.. हालाँकि एक बात अब साफ़ हो चुकी है कि अगर शहर, राज्य या फिर देश की हवा का साफ़ रखना है तो इसमें हर व्यक्ति को भागीदारी देनी होगी… अपने अपने स्तर पर प्रदुषण को कम करने के उपाय करने होगे… और अंत में एक जरूरी बात.. कोरोना से बचाव सिंगल यूज सामान से नही से  बल्कि साफ़ सफाई और बनाए गये से नियमों करना है..