कोरोना वायरस की वजह से घर बैठने से हो रही हैं ये बीमारियाँ, बच्चों को लेकर भी हो जाएँ सावधान

कोरोना वायरस जब से अस्तित्व में आया है उसके बाद से ही पूरी दुनिया में कुछ चीजों का प्रचलन तेजी से बढ़ गया है. जैसे वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन स्टडी, मोबाइल, लैपटॉप या फिर टीवी में मूवी अधिक देखना.. लेकिन क्या आपको पता है कि महामारी कोरोना वायरस से बचाव करने की जुगत में लगे इंसान कई अन्य बीमारियों से ग्रसित होते जा रहे हैं.

एक स्टडी में कहा गया है कि कम से कम 27.5 करोड़ भारतीयों या लगभग 23 फीसदी आबादी ने ज्यादा स्क्रीन देखने के कारण अपनी आंखों की रोशनी को कमजोर होता हुआ महसूस किया है. मोतियाबिंद, ग्लूकोमा और उम्र से संबंधि मैक्यूलर डीजनरेशन जैसे दूसरे फैक्टर्स ने ने भी आंखों की रोशनी को प्रभावित किया है.

2020 में भारत में प्रति उपयोगकर्ता ने औसत स्क्रीन समय 6 घंटे 36 मिनट का रहा

इसी के साथ ये जानकारी भी सामने आई है कि 2020 में भारत में प्रति उपयोगकर्ता ने औसत स्क्रीन समय 6 घंटे 36 मिनट का रहा, मतलब वो लगभग साढ़े छह घंटे तक स्क्रीन पर काम किया या फिर उसे किसी वजह से देखा है.. जो अलग-अलग देशों से काफी कम है. अधिक समय तक स्क्रीन देखने के मामले में जो देश भारत से आगे हैं उनमें फिलीपींस (10:56 घंटे), ब्राजील (10:08 घंटे), दक्षिण अफ्रीका (10:06 घंटे), अमेरिका (07:11 घंटे) और न्यूजीलैंड (06:39 घंटे) समेत कई देश शामिल हैं.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि स्क्रीन टाइम में बढ़ोतरी में लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का प्रमुख योगदान रहा है, क्योंकि लोग लंबे समय तक अपने घरों पर बंद रहे और घर से ही काम करते रहे.  ब्रिटेन के फील-गुड कॉन्टैक्ट्स की रिपोर्ट जिसमें लैंसेट ग्लोबल हेल्थ, डब्ल्यूएचओ, और स्क्रीन टाइम ट्रैकर डेटा रिपोर्टल जैसे अलग स्रोतों से डेटा मिला था.

चीन के लोगों ने कम समय बिताया लेकिन हुआ अधिक नुकसान 

चीन को लेकर इस रिपोर्ट में हैरान करने वाली बात सामने आई है..  चीन में ऑनलाइन या फिर स्क्रीन पर बिठाये गये घंटे कम हैं लेकिन आंखों की रोशनी के नुकसान की दर अधिक है. चीन में उपयोगकर्ताओं द्वारा स्क्रीन के साथ बिताए गए औसतन 5 घंटे और 22 मिनट है  लेकिन इसने  27.4 करोड़ लोग या 14.1 फीसदी आबादी को प्रभावित किया है.

वहीँ दिल्ली के बच्चों को लेकर भी एक परेशान करने वाली रिपोर्ट सामने आई है. एक सर्वे के दौरान इस बात का पता चला है दिल्ली में 51 प्रतिशत बच्चों का बॉडी मास इंडेक्स (BMI) अस्वस्थ है.  यह सर्वे स्पोर्ट्ज विलेज स्कूलों द्वारा किए गए 11वें वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण का हिस्सा हैं, जिससे पता चलता है कि पिछले सर्वे की तुलना में, दिल्ली में बच्चों के लिए अस्वस्थ बीएमआई प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई है. पिछले साल के सर्वे के अनुसार, दिल्ली में 50 प्रतिशत बच्चों का बीएमआई अस्वस्थ था.

दिल्ली के बच्चों की बीएमआई को लेकर रिपोर्ट अच्छी नही 

दिल्ली में 10 में से 9 बच्चे एरोबिक क्षमता के मामले में अस्वस्थ पाए गए, जबकि कोर स्ट्रेंथ के मामले में 5 में से 2 बच्चे अस्वस्थ पाए गए. कुल मिलाकर, स्वस्थ बीएमआई स्तर (48 प्रतिशत) वाली लड़कियों का प्रतिशत लड़कों (44 प्रतिशत) की तुलना में अधिक पाया गया. रोबिक क्षमता हृदय और फेफड़ों की मांसपेशियों को ऑक्सीजन प्राप्त करने की क्षमता है, जबकि मुख्य ताकत धड़ की मांसपेशियों की ताकत है.
इन दोनों रिपोर्ट्स से एक बात ये निकल कर सामने आ रही है कि कोरोना से बचाव के लिए हम घर पर रहने के लिए ज्यादा जोर दे रहे हैं लेकिन अब घर पर रहने से भी कई तरह की परेशानियां खड़ी हो रही हैं जो आगे चलाकर एक बड़ी मुसीबत बन सकती है. इसलिए आप अपने दिनचर्या को ठीक तरीके से एडजस्ट करें ताकि आपके शरीर को नुकसान ना पहुंचे!