इस बार ऐसे मनाए होलिका दहन, पर्यावरण रहेगा सुरक्षित…

होली का त्योहार बस आने ही वाला है..जैसा की हमें पता है कि होली से एक दिन पहले रात में होलिका दहन भी किया जाता है. परम्परा के अनुसार होली के एक रात पहले हम ढेर सारी लकड़ियों को इकट्ठा कर उसे जलाते है..लेकिन इतनी अधिक मात्रा में लकड़ी को जलाना ना सिर्फ़ प्रदूषण को बढ़ाता है बल्कि लकड़ी के लिए कई पेड़-पौधे को काटकर हम नष्ट कर देते है..जिससे हमारे पर्यावरण को काफ़ी नुक़सान होता है..ऐसे में हम आपको इस वीडियो में बताने जा रहे है..बिना पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाए आप कैसे होलिका दहन मना सकते है..

अगर पर्यावरण को सुरक्षित रखना है तो हमें इस बार 9 मार्च को होने वाले होलिका दहन के अवसर पर गोबर से बने कंडे की होली जलानी चाहिए..क्योंकि कंडे की होली जलाने से न सिर्फ पर्यावरण प्रदूषित होने से बचता है बल्कि लकड़ियों की खपत भी कम हो जाएगी..इसके साथ ही वृक्षों को बचाए रखने में मदद मिलेगी..और हरियाली बनी रहेंगी.. बता दें कि कंडों को जलाने के पीछे धार्मिक वजह के साथ-साथ वैज्ञानिक कारण भी हैं, क्योंकि कंडे प्रदूषण नहीं फैलाते और वातावरण को शुद्ध रखने में सहायक होते हैं..साथ ही शहर से लेकर गाँव तक कंडे आसानी से मिल जाते है..क्योंकि गाय और भैंस की नस्ल के पशुओं के गोबर के कंडे आसानी से मिल जाते है.. जैसा की हम जानते है कि हमारी पुरानी सनातन धर्म की परंपरा में कंडों से यज्ञ, हवन करने का अलग ही महत्व है..

कोई भी धार्मिक आयोजन गोबर से बने कंडों के बगैर अधूरा रहता है..तो यों ना हम इस बार लकड़ियां और प्लास्टिक आदि की वस्तुओं के स्थान पर गोबर से बने कंडे का इस्तेमाल करें..और अपने आस-पास के वातावरण को शुध्द रखें..क्योंकि हम सभी को वृक्षों को सुरक्षति रखने का प्रयास करना होगा तभी पर्यावरण का संतुलन संभव है..इसके लिए सभी के मिले-जुले प्रयासों की जरुरत है..अगर जरूरत पड़े तो आप एक छोटे पेड़ की टहनी भी रख सकते हैं.. इससे पेड़ों का नुकसान कम होगा.. अगर आप भी कंडी की होली जला रहा है.. या फिर आप ऐसी होलिका जला रहे हैं तो आप अपनी सेल्फी हम तक WHATSAPP के जरिये जरूर पहुंचाइये.. हम उसे अपने दर्शकों तक शेयर करेंगे.