भारत में कृषि में पानी के ज्यादा उपयोग से तेजी से घट रहा है जलस्तर

रांची: विकास की अपनी चिंताएं होती हैं। सिंचाई, पीने के पानी और दूसरी जरूरतों के लिए जरूरत से ज्यादा दोहन के चलते ध्रती का जलस्तर लगातार घट रहा है। इसने न सिपर्फ भूवैज्ञानिकों की बल्कि राजनीतिज्ञों की चिंता भी बढ़ा दी है। वर्ष 1997 में देश में जलस्तर 550 क्यूबिक किलोमीटर था। लेकिन ताजा अनुमान के मुताबिक, सन 2020 तक भारत में यह जलस्तर गिरकर 360 क्यूबिक किलोमीटर रह जाएगा। यही नहीं, वर्ष 2050 तक यह जलस्तर और गिरकर महज सौ क्यूबिक किलोमीटर से भी कम हो जाएगा। इसके साथ अगर देश में पानी की बढ़ती मांग को ध्यान में रखें तो तस्वीर भयावह नजर आती है। मोटे अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2050 तक भारत को सालाना 1,180 अरब घनमीटर पानी की जरूरत होगी। ऐसे में अगर जल संरक्षण और उसके जरिए भूमिगत जलस्तर को रिचार्ज करने की दिशा में समुचित उपाय नहीं किए गए तो देश की दो-तिहाई आबादी को प्यासा रहने पर मजबूर होना पड़ेगा। राजधानी दिल्ली में भी यह समस्या धीरे-धीरे गंभीर हो रही है। हर साल गर्मी का पारा बढ़ने के साथ ही देश के सभी हिस्सों में जलसंकट गहराने लगता है। शहरी क्षेत्रा हो या ग्रामीण क्षेत्रा, पानी की समस्या दोनों जगह समान रूप से गंभीर होती जा रही है। भारत जैसे विशाल देश में सभी को साफ और शद्व पेयजल मुहैया कराना एक बड़ी चुनौती जैसा ही है।

भारत, दुनिया की लगभग 17 पफीसदी आबादी को समेटे हुए है जबकि देश में पानी की उपलब्ध्ता मात्रा 4 पफीसदी है। यदि हम पूरे विश्व की बात करें तो धरती का 70 प्रतिशत भाग जलमग्न है लेकिन इनमें से पीने लायक पानी की मात्रा महज 3 प्रतिशत है इसमें से भी 2 प्रतिशत पानी महासागरों में ग्लेशियर के रूप में है जिससे मानव जाति के हिस्से में मात्रा 1 प्रतिशत पानी ही उपयोग के लिए उपलब्ध् है।
पानी पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है और इसके स्रोत घटते जा रहे हैं। हमें पेयजल, दैनिक दिनचर्या, कृषि कार्यों और उद्योग ध्ंधें में पानी की आवश्यकता होती है जिनकी पूर्ति के लिए हम उपलब्ध् जल संसाध्नों के साथ-साथ भूजल का भी जमकर दोहन कर रहे हैं। लगातार हो रहे दोहन से भूजल का स्तर प्रतिवर्ष 1 से 1.5 प्रतिशत की दर से नीचे जा रहा है। परिणामस्वरूप जल स्रोत सूखने लगे हैं और जलसंकट गहराने लगा है। भारत सिंचाई के लिए जल में एक-तिहाई तक बचत कर सकता है और इसके साथ-साथ अपनी लगातार कुपोषण की समस्या को भी हल कर सकता है, यदि यह देश चावल की पफसल पर ध्यान न दे कर, ऐसे पफसल उपजाए, जिनको कम पानी की जरूरत होती है । यह जानकारी 43 वर्षों में सिंचाई-पानी के उपयोग पर किए गए एक अघ्ययन में सामने आई है।

भारत में उगाए जाने वाले अनाजों में से, कम पोषक तत्वों ( लोहा, जस्ता और प्रोटीन को वितरित करते हुए, चावल प्रति टन उत्पादन पर सबसे अधिक पानी खपत करता है, जैसा कि एक वैश्विक विज्ञान पत्रिका, श्साइंस एडवांसेसश् में प्रकाशित एक अघ्ययन में बताया गया है। चावल के लिए सुझाए गए प्रतिस्थापन मक्का, बाजरा, मोती बाजरा और ज्वार हैं। ये सभी अनाज प्रति टन कम पानी का उपभोग करते हैं और अध्कि पौष्टिक होते हैं। ऐसा पहली बार है कि वैज्ञानिकों ने पौष्टिक लाभ के साथ एक वैकल्पिक पफसल पैटर्न को जोड़कर जल-बचत की एक संभावना को सामने लाया है। अध्कि पोषक तत्व युक्त या कम पानी की जरूरत वाले पफसल के साथ चावल को प्रतिस्थापित करना प्रोटीन पफीसदी के उत्पादन में तो मामूली रूप से सुधर करेगा, लेकिन 27 पफीसदी और 13 पफीसदी तक लोहे और जिंक के उत्पादन में वृद्वि होगी। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2030 तक 71 प्रतिशत वैश्विक जल का उपयोग कृषि कार्यों में किया जाएगा। हम दुनिया के उन देशों की सूची में सबसे ऊपर हैं, जो भूजल का सबसे ज्यादा दोहन करते हैं। तेजी से गिरते भूजल स्तर पर वैज्ञानिकों ने भी कई बार चिंता जताई है। उनका कहना है कि उत्तर भारत में यह स्तर तेजी से गिरता जा रहा है और लाखों लोगों के लिए इसके गंभीर परिणाम होंगे। नेचर पत्रिका में भी शोध्कर्ताओं ने लिखा है कि सिंचाई और दूसरे उपयोग के लिए के लिए पानी की खपत सरकारी अनुमान से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ी है। इस कारण कृषि उत्पादन ठप हो सकता है और पीने के पानी की भयंकर किल्लत हो सकती है। पानी पर हमारी सबसे अध्कि निर्भरता कृषि कार्यों के लिए होती है। पहले खेतों में सिंचाई पारंपरिक और प्राचीन तरीकों से होती थी।

अब हम खेतों में सिंचाई के लिए ट्यूबवेल पंप का उपयोग कर रहे हैं जिससे धरती की गहराई में जमा पानी निकल रहा है और भूजल का स्तर भी घट रहा है। नीति आयोग ने बढ़ते जल संकट के लिए गन्ना और धन की पफसल को भी जिम्मेदार माना है। किसान सवाल कर रहे हैं कि आखिर वे क्या कर पिफलहाल, हरियाणा पहला ऐसा राज्य है जिसने सबसे पहले इस हालात को गंभीरता से लेते हुए धन की खेती को डिस्करेज करने का न सिपर्फ पफैसला लिया बल्कि इसके लिए एक स्कीम भी बनाई। ऐसी स्कीम जल संकट का सामना कर रहे दूसरे राज्य भी बना सकते हैं. केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि हरियाणा में तेजी से भूजल स्तर गिर रहा है. प्रदेश के 76 पफीसदी हिस्से में भूजल स्तर बहुत तेजी से गिरा है. हरियाणा, पंजाब व राजस्थान में भूजल स्तर 300 मीटर तक पहुंचने का अंदेशा है। एक किलो काॅटन पैदा करने पर 22 हजार लीटर पान खर्च होता है । महाराष्ट्र सबसे ज्यादा सूखे की चपेट में है । अगर कृषि वैज्ञानिकों की रिसर्च पर विश्चास करें तो ऐसा यूं ही नहीं है । पानी की सबसे ज्यादा खपत करने वाली कपास और गन्ने की यहां सबसे अधिक खेती होती है। गन्ने के उत्पादन में पहले नंबर पर यूपी, दूसरे पर महाराष्ट्र और तीसरे पर कर्नाटक है । जबकि काॅटन में गुजरात पहले और महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर है । धन की पफसल पैदा करने में पश्चिम बंगाल पहले, यूपी दूसरे और आंध््रा प्रदेश तीसरे नंबर पर है ।

एक किलो काॅटन पैदा करने पर 22 हजार लीटर पानी खर्च होता है
महाराष्ट्र सबसे ज्यादा सूखे की चपेट में है । अगर कृषि वैज्ञानिकों की रिसर्च पर विश्चास करें तो ऐसा यूं ही नहीं है । पानी की सबसे ज्यादा खपत करने वाली कपास और गन्ने की यहां सबसे अधिक खेती होती है । गन्ने के उत्पादन में पहले नंबर पर यूपी, दूसरे पर महाराष्ट्र और तीसरे पर कर्नाटक है । जबकि काॅटन में गुजरात पहले और महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर है । धन की फसल पैदा करने में पश्चिम बंगाल पहले, यूपी दूसरे और आंध््रा प्रदेश तीसरे नंबर पर है ।
कृषि में होता है सर्वाध्कि पानी इस्तेमाल

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के नवीनतम आँकड़ों के मुताबिक भारत में 90ः पानी का इस्तेमाल कृषि में होता है। इसमें कमी किये बिना ग्रामीण एवं शहरी घरेलू जरूरतों और उद्योगों के लिये पर्याप्त पानी उपलब्ध करा पाना लगभग असंभव है। इसके लिये जल सुधार बेहद आवश्यक हैं, जिनके बिना कृषि संकट को हल नहीं किया जा सकता। देश में पानी की अधिकांश खपत गेहूँ, चावल और गन्ने जैसी पानी की अधिक जरूरत वाली फसलों में होती है। महाराष्ट्र जैसे सूखे की आशंका वाले राज्य में भी यही स्थिति है, जहाँ कुल पफसली क्षेत्रा में गन्ने का हिस्सा केवल 4ः है, लेकिन इस पफसल में 65ः सिंचाई के पानी की खपत होती है। पानी की कमी वाले क्षेत्रों में भी किसान पानी की अध्कि जरूरत वाली पफसलें उगा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि इनके लिये सरकारी खरीद या निजी खरीद के रूप में एक भरोसेमंद बाजार है।

भारत में होता है सबसे अधिक भूजल दोहन:

भारत हर साल 230-250 क्यूबिक किलोमीटर भूजल का निष्कर्षण करता है, जो पूरी दुनिया में निकाले जा रहे भूजल का एक-तिहाई है।
जो किसान इस भूजल का इस्तेमाल खेती के लिये करते हैं वे जमीन पर मौजूद पानी की तुलना में दोगुना अनाज पैदा करते हैं, क्योंकि भूजल किसानों को अपनी सुविधा के अनुसार खेती करने की अनुमति देता है।
1960-70 के दशक में भारत भूजल का सबसे अधिक दोहन करने वाला देश नहीं था, लेकिन हरित-क्रांति ने सब कुछ बदल दिया।
आजादी के दौरान भारत की कृषि में भूजल का 35ः हिस्सा इस्तेमाल होता था, जो आज 70ः तक पहुँच गया है।

आज कृषि क्षेत्रा निकाले गए भूजल का लगभग 90ः पानी इस्तेमाल करता है, लेकिन देश की में उसका योगदान मात्रा15-16ः है। घरेलू कामकाज में 9ः और उद्योगों में 2ः भूजल का इस्तेमाल होता है। पानी के लगातार दोहन से भूजल स्तर लगातार नीचे खिसकता जा रहा है। अब समय आ गया है कि हम जितना पानी धरती से लेते हैं उतना ही पानी धरती को किसी-न-किसी रूप में लौटाएँ। यह रेनवाटर हार्वेस्टिंग से ही संभव है। हमारा दायित्त्व है कि हम पानी की एक बूँद भी बेकार न जाने दें। इससे हमारा भूजल रिचार्ज हो जाएगा तथा जलस्तर भी ऊपर उठेगा।

वैज्ञानिकों की ये सलाह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत आज अपने इतिहास में सबसे बड़े जल संकट से जूझ रहा है और दूसरी ओर कुपोषण के रूप में लोहे और जस्ता की कमी से लड़ रहा है। यह अध्ययन, श्अल्टरनेटिव सिरीअल्ज कैन इंप्रूव वॉटर यूज एंड न्यूट्रिएंट यूज इन इंडियाश्, 4 जुलाई, 2018 को प्रकाशित किया गया था। नए अध्ययन में कहा गया है कि 2009 में 632 क्यूबिक किलोमीटर (सीयू किमी) पानी का लगभग एक-तिहाई (34 फीसदी) भारत ने अनाज उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया था, वह विभिन्न सिंचाई स्रोतों से आया था। बाकी के लिए वर्षा के पानी का इस्तेमाल किया गया। भारत की कृषि पारिस्थिति की ऐसी पफसलों के अनुकूल है, जिसके उत्पादन में अधिक जल की आवश्यकता होती है, जैसे- चावल, गेहूँ, गन्ना, जूट और कपास इत्यादि। इन फसलों वाले कृषि क्षेत्रों में जल संकट की समस्या विशेष रूप से विद्यमान है। हरियाणा और पंजाब में कृषि गहनता से ही जल संकट की स्थिति उत्पन्न हुई है। गन्ने की खेती में लगने वाले पानी की मात्रा पर गौर कीजिए।

गन्ने की एक टन वजन वाली फसल को तैयार करने में करीब 250 टन पानी लगता है। दूसरे नजरिये से देखें तो 12 महीने से 18 महीने में तैयार होने वाली इस फसल में 180 से लेकर 250 सेंटीमीटर पानी की दरकार होती है। यह भारत में चार महीनों के मॉनसून सत्र में होने वाली औसतन 89 सेंटीमीटर बारिश के दोगुने से भी अधिक है। यह साल भर में होने वाली 120 सेंटीमीटर बारिश से भी काफी अधिक है। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं है कि पर्यावरण संरक्षण की आवाज उठाने वाले संगठन देश के अधिकांश इलाकों में बढ़ रहे पानी के संकट के मद्देनजर गन्ने की खेती को लेकर चिंताएं जताने लगे हैं। इन पर्यावरण कार्यकर्ताओं का यहां तक कहना है कि गर्म और कम बारिश वाले इलाकों में गन्ने की खेती पर रोक लगा देनी चाहिए। कृषि विभाग के आंकड़े बताते है कि ढाई एकड़ खेत में 42 क्विंटल धान उपजाने के लिए 50 लाख लीटर पानी का उपयोग होता है। देश में प्रति व्यक्ति वार्षिक पानी उपलब्ध्ता वर्ष 2025 तक घटकर 1,465 घन मीटर रह जाने का अनुमान है. भारतीय कृषि अनुसंधन परिषद ;आईसीएआरद्ध के एक शीर्ष अधिकारी ने यह जानकारी देते हुए पानी की खपत कम करने के लिए प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल बढ़ाने और फसलों के विविधीकरण पर जोर दिया.

आईसीएआर ने यह भी घोषणा की कि वह भारत के लिए पफसल योजना के संबंध में सुझाव देने के मकसद से एक तंत्रा विकसित करने की ओर ध्यान दे रहा है, जिसके तहत किसानों को यह सुझाव दिया जाएगा कि किस क्षेत्रा में किस पफसल को उगाया जाए. कृषि क्षेत्रा में जल प्रबंधन के बारे में मीडिया को जानकारी देते हुए बीते पांच सितंबर को एक कार्यक्रम के दौरान आईसीएआर के महानिदेशक टी. महापात्रा ने बताया कि प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्ध्ता वर्ष 1951 में 5,177 घन मीटर थी जो वर्ष 2014 में घटकर 1,508 क्यूबिक मीटर रह गई है. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, ‘पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्ध्ता वर्ष 2025 तक 1,465 घन मीटर और वर्ष 2050 तक 1,235 घन मीटर तक घटने जाने का अनुमान है. यदि यह और घटकर 1,000-1,100 क्यूबिक मीटर के आसपास रह जाती है तो भारत को जल संकट वाला देश घोषित किया जा सकता है.’ महापात्रा ने आशंका जाहिर की कि ऐसी स्थिति में पानी को लेकर राज्यों के भीतर और अलग-अलग राज्यों के बीच लड़ाई बढ़ सकती है.

आगे की राह
ज्यादा पानी वाली पफसलों जैसे गेहूँ, चावल आदि को मोटे अनाजों से स्थानांतरित किया जाना चाहियेय क्योंकि इन पफसलों के प्रयोग से लगभग एक तिहाई पानी को सुरक्षित किया जा सकेगा। साथ ही मोटे अनाजों का पोषण स्तर भी उच्च होता है।
कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कम पानी वाली पफसलों के उपयोग को बढ़ाया जाना चाहिये। हाल ही के वर्षों में तमिलनाडु सरकार द्वारा ऐसे प्रयास किये गए हैं। जल उपभोग दक्षता को बढ़ाया जाना चाहिये, क्योंकि अभी तक सर्वश्रेष्ठ मामलों में यह 30ः से भी कम है।
जल संरक्षण हेतु जन जागरूकता अतिआवश्यक है, क्योंकि भारत जैसे देशों की अपेक्षा कम जल उपलब्धता वाले अमेरिका के कुछ क्षेत्रों में अभी तक जल संकट की कोई समस्या उत्पन्न नहीं हुई है।