जातीय जनगणना से देश को क्या है फायदा? जानें पक्ष और विपक्ष दोनों के तर्क क्या है?

देश में जातीय जनगणना की मांग एक बार फिर से तेज होने लगी है..जातीय जनगणना यानी देश में किस जाति की आबादी कितनी है इसकी गणना करना…. जातिगत जनगणना की मांग को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत दस दलों के नेताओं के प्रतिनिधिमनंडल ने पीएम मोदी से मुलाकात की है. ऐसे में आईए पहले जान लेते है कि इसका देश पर क्या प्रभाव पड़ेगा…जातीय जनगणना के पक्ष और विपक्ष के तर्क क्या-क्या है..लेकिन उससे पहले इसके इतिहास पर एक नजर डालते है.

इतिहास पर नजर डाले तो किस जाति की आबादी कितनी है इसको लेकर भारत में जातीय जनगणना की मांग काफी पहले से उठती रही है. देश में पहली बार जनगणना साल 1881 में हुई थी, जिसके बाद हर 10 साल पर जनगणना होती रहती है. आखिरी बार जाति आधारित जनगणना साल 1931 में हुई थी. यानी 9 दशक पहले जाति के हिसाब से जनगणना हुई थी. साल 1941 में जनगणना के समय जाति आधारित डेटा जुटाया ज़रूर गया था, लेकिन प्रकाशित नहीं किया गया. साल 1951 से साल 2011 तक की जनगणना में हर बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का डेटा दिया गया, लेकिन ओबीसी और दूसरी जातियों का नहीं. इसी कारण से देश में कई साल से जातीय जनगणना की मांग हो रही है. लेकिन इसको लेकर कई पार्टीयां पक्ष में तो कई विपक्ष में है..

पक्ष में तर्क

  • विकास कार्यक्रम बनाने के लिए जरूरी
  • सरकारी नीतियां और योजनाएं बनाने में मददगार साबित हो सकता है
  • इसके अलावा पता चलेगा कौन सी जाति कितने पिछड़ेपन का शिकार है
  • किस जाति में कितने लोग आज भी बदतर जिंदगी जीने को मजबूर है इसका भी पता चल जाएगा.
  • इससे किसी भी जाति की आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा की वास्तविक जानकारी मिल जाएगी.
  • पक्ष में तर्क ये भी दिया जाता है कि एससी-एसटी की होती है तो बाकियों की क्यों नहीं

विपक्ष में तर्क

  • जातीय जनगणना कराए जाने से देश का सामाजिक ताना-बाना बिगड़ सकता है
  • सर्वे के आधार पर योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है, इसलिए इसकी कोई जरूरत नहीं है
  • परिवार नियोजन के प्रयासों पर विपरीत असर पड़ सकता है जिससे देश की जनसंख्या और बढ़ सकती है (आसान भाषा में समझाय तो देश में जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने पर चर्चा की जा रही है. ऐसे में जातिगत आधार पर जब किसी को यह पता चलेगा कि उनके समाज की संख्या घट रही है, तो वह जाति परिवार नियोजन को अपनाना छोड़ सकती है, जिससे देश की जनसंख्या में और भी अधिक तेजी से इजाफा हो सकता है)
  • देश में अनुसूचित जाति और जनजाति की जनगणना इसलिए कराई जाती है क्योंकि संविधान के तहत उन्हें सदन के अंदर आरक्षण दिया गया है. जातीय जनगणना के आधार पर तैयार की गई संख्या के आधार पर अनुसूचित जाति और जनजाति के सीट को घटाया बढ़ाया जाता है.

तो हमने आपको यहां बताया जातीय जनगणना का मतलब क्या है और इसके पक्ष और विपक्ष के पार्टियों के तर्क क्या है..बिहार के नेताओं के लिए जातिगत जनगणना कितना अहम है इसका अंदाजा आप इसी बात से लगाइए कि राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में ऐसी तस्वीर देखने को नहीं मिली, जहाँ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव दोनों किसी एक मुद्दे पर एकमत हो…और पीएम मोदी से किसी एक मुद्दे को लेकर मिले हो..ऐसे में अब देखने वाली बात होगी कि आख़िरकार जातिगत जनगणना को लेकर प्रधानमंत्री की तरफ से क्या फैसला लिया जाता है.