‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ क्या है? यहां जाने इससे जुड़ी सभी बातें

यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर देश में आए दिन चर्चा होती रहती है..और एक बार फिर से ये चर्चा जोर पकड़ चुकी है..जब से मोदी सरकार ने तीन तलाक़, राम मंदिर,370,नागरिकता संशोधन कानून जैसे विवादित मुद्दों पर कड़े और ज़ोरदार फ़ैसला किया है तब से बहुत लोगों को ऐसा लग रहा है कि मोदी सरकार यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड लागू कर सकती है..लोगों का मानना है कि बीजेपी अपने इस वादे को पूरा कर इसको संसद में पास करा कर इसके लिए एक्ट लाएगी..क्योंकि कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि बीजेपी ने अब तक ऐसे फ़ैसले किए है जिन फ़ैसलों के बारे में विपक्षी पाटियाँ अपने वोट बैंक की राजनीति के लिए बात भी नहीं करती थी.. लेकिन बीजेपी ने इसे लागू कर दिया..बहरहाल, यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड बीजेपी लागू करती है या नहीं ये तो देखने वाली बात होगी..लेकिन जब चर्चा इस बात की हो रही है तो यहाँ इसके बारे में जानना बेहद ज़रूरी है कि यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड है क्या और अगर ये लागू होता है तो क्या बदलाव होंगे.

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यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड क्या है? यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड को कॉमन सिविल कोड या समान नागरिक संहिता के रूप में भी जानते हैं.इसका अर्थ एक सेक्युलर यानी की धर्मनिरपेक्ष क़ानून होता है जो सभी धर्म के लोगों के लिए समान रुप से लागू होता है..

आसान भाषा में समझे तो यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब है देश में हर नागरिक के लिए एक समान कानून का होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो. फिलहाल देश में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ हैं. यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने से हर धर्म के लिए एक जैसा कानून आ जाएगा. हिंदू हो, मुसलमान, सिख या ईसाई सबके लिए शादी, तलाक,पैृतक संपत्ति जैसे मसलों पर एक तरह का कानून लागू हो जाएगा. महिलाओं का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में भी एक समान नियम लागू होंगे..फिलहाल हर धर्म के लोगों से जुड़े मामलों को पर्सनल लॉ के माध्यम से सुलझाया जाता है. यूनियन सिविल कोड का अर्थ एक निष्पक्ष कानून है, जिसका किसी धर्म से कोई ताल्लुक नहीं है..

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दूसरे शब्दों में कह सकते है कि अलग-अलग धर्मों के लिये अलग-अलग सिविल कानून न होना ही ‘समान नागरिक संहिता’ का मूल अर्थ है. लेकिन जब-जब कॉमन सिविल कोड की बात सामने आई उसका विरोध शुरू हो गया है..क्योंकि देश में जब भी सभी समुदायों के लिए एक जैसा कानून और नियम लाने की बात होती है तो उसका जमकर विरोध होता रहा है.यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध करने वालों का कहना है कि ये सभी धर्मों पर हिन्दू कानून को लागू करने जैसा है..बता दें कि आजादी के तुरंत बाद 1951 में भी तत्कालीन कानून मंत्री डॉ. बीआर अंबेडकर ने जब हिंदू समाज के लिए हिंदू कोड बिल लाने की कोशिश की तो न सिर्फ इसका जोरदार विरोध हुआ बल्कि सिर्फ एक धर्म विशेष के लिए ऐसा कानून लाने पर सवाल उठाए गए.जबरदस्त विरोध के बाद इस बिल को चार हिस्सों में बांट दिया गया था. इसके अलावा जब भी कॉमन सिविल कोड को लाने की कोश‍िश हुई, इसका एक वर्ग द्वारा जोरदार विरोध हुआ.

हालांकि पर्सनल लॉ मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का है जबकि जैन, बौद्ध, सिख और हिंदू हिंदू सिविल लॉ के तहत आते हैं. क्यों समान नागरिक संहिता भारत के लिए जरुरी है? अलग-अलग धर्मों के अलग कानून से न्यायपालिका पर बोझ पड़ता है। समान नागरिक संहिता लागू होने से इस परेशानी से निजात मिलेगी और अदालतों में वर्षों से लंबित पड़े मामलों के फैसले जल्द होंगे। शादी, तलाक, गोद लेना और जायदाद के बंटवारे में सबके लिए एक जैसा कानून होगा फिर चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो। वर्तमान में हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ यानी निजी कानूनों के तहत करते हैं। सभी के लिए कानून में एकसमानता से एकता को बढ़ावा मिलेगा और जिस देश में नागरिकों में एकता होती है उस देश का तेजी से विकास होता है.  देश में हर भारतीय पर एक समान कानून लागू होने से देश की राजनीति पर भी असर पड़ेगा और राजनीतिक दल वोट बैंक वाली राजनीति नहीं कर सकेंगे और वोटों का ध्रुवीकरण नहीं होगा.

यूनिफॉर्म सिविल कोड इन देशों में है एक तरफ जहां भारत में सभी धर्मों को एक समान कानून के तहत लाने पर विवाद है, वहीं पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान और इजिप्ट जैसे कई देश इसे लागू कर चुके हैं. हालांकि, इनमें से कई देशों में इस्लाम धर्म राजधर्म की तरह है और सभी पर इस्लामी कानून लागू होते है..बता दें कि भारत में गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ समान नागरिक संहिता क़ानून लागू है.. अगर समान नागरिक आचार संहिता यानी Uniform Civil Code लागू हो जाता है तो हर मजहब के लिए एक जैसा कानून आ जाएगा। मतलब नागरिक किसी भी धर्म का हो या किसी भी जाति का उसके प्रति किसी भी तरह का भेद-भाव नहीं होगा।यह किसी भी धर्म या जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है। विश्व के अधिकतर आधुनिक देशों में ऐसे कानून लागू हैं..