जब नेताजी के दिमाग का हिटलर ने भी माना था लोहा, आज पूरा देश कर रहा है नमन

“तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’ का नारा बुलंद किया था.. याद रखिए सबसे बड़ा अपराध अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना है.  सफलता हमेशा असफलता के स्तंभ पर खड़ी है.” ऐसे ना जाने कितने कथन कहने वाले क्रांतिकारी, स्वतंत्रा सेनानी, आजाद हिंद फ़ौज के जनक सुभाष चन्द्र बोस की आज 125वीं जयंती है.. पूरा देश उन्हें याद कर रहा है, नमन कर रहा है..
नेताजी की जिन्दगी आज भी सवालों के घेरे में हैं.. उनके बारे में.. खासकर उनके अंतिम दिनों के बारे में अभी तक कोई सटीक और ठीक जानकारी सामने नही आई है.. इसको लेकर कई बार विवाद भी हुआ है.. हालाँकि कुछ खुफिया जानकारियाँ सरकार के पास है ऐसा दावा किया जाता है और उसे सार्वजनिक करने की मांग भी की जाती है..
वैसे कहा जाता है कि नेताजी का निधन एक विमान दुर्घटना में 1945 में हुई थी लेकिन बहुत से लोगों का ऐसा भी मानना है कि नेता जी कई सालों गुमनामी बाबा के नाम से भारत में रह रहे थे लेकिन किसी को ये पता नही चल सका कि वे ही नेता जी है., कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर साधु की वेश में रहते थे जिसमें निमसर, बस्ती, अयोध्या और फैजाबाद जगहें शामिल है. इस दौरान वे बहुत कम लोगों से ही मिलते जुलते थे. 16 सितंबर, 1985 को गुमनामी बाबा का निधन हो गया और 18 सितंबर को दो दिन बाद उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया.. जिन्हें कई लोग नेताजी ही मान रहे हैं..


गुमनामी बाबा के विश्वासियों ने 2010 में अदालत का रुख किया और उच्च न्यायालय ने उनका पक्ष लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को गुमनामी बाबा की पहचान स्थापित करने का निर्देश दिया गया था। सरकार ने 28 जून 2016 को एक जांच आयोग का गठन किया, जिसके अध्यक्ष न्यायमूर्ति विष्णु सहाय थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘गुमनामी बाबा’ नेताजी के अनुयायी थे, लेकिन नेताजी नहीं थे।

तो आखिरकार नेताजी कहाँ थे? सवाल अभी भी वही हैं और इसका जवाब शायद किसी के पास नही है.

हालाँकि गुमनामी बाबा के निधन के बाद जब उनके नेता होने की खबर उड़ने लगी तो नेताजी की भतीजी ललिता बोस को उनकी मृत्यु के बाद गुमनामी बाबा के कमरे में मिली वस्तुओं की पहचान करने के लिए फैजाबाद बुलाया गया…. जहाँ उन्होंने नेताजी के परिवार की कुछ वस्तुओं की पहचान की लेकिन बाबा के कमरे में 25 स्टील ट्रंक में 2,000 से अधिक लेखों का संग्रह मिला था। उनके जीवनकाल में इसे किसी ने नहीं देखा था। वहीँ एक नही बल्कि दो आयोग ने इस बात की पुष्टि की ‘गुमनामी बाबा’ नेताजी नहीं थे।

वहीँ विमान हादसे के दौरान हुई मौत की बात की सत्यता को प्रमाणित करने के लिए और इसे नकारने के लिए दोनों के ही साक्ष्य पब्लिक डोमेन में काफी कम उपलब्ध है.. आजाद हिंद फौज पर लिखी कई किताब ‘नेताजी की पराक्रमी सेना’ किताब के 6 पन्नों को लेकर भी विवाद है. क्योंकि इस किताब के इन 6 पन्नों को भारत सरकार द्वारा गोपनीय घोषित किया गया है तभी से यह किताबों लोगों के बीच नेताजी के जीवन को लेकर चर्चा का विषय बनी हुई है. लोग ऐसा मानते हैं कि इस किताब में नेताजी के विमान हादसे से संबंधित जानकारियां हैं. लेकिन ये भी दावा किया जाता है कि नेता जी कनिधन विमान हादसे में नही हुआ था… क्योंकि ताइपेई में जिस दिन नेताजी के विमान हादसे का जिक्र किया जाता है. उस विमान हादसे का कोई रिकॉर्ड ताइपेई एयरपोर्ट अथॉरिटी के पास नहीं है. उनका कहना है कि उस दिन ऐसा कोई हादसा यही नहीं हुआ था.

नेता जी से जुड़ा एक किस्सा है जिसमें हिटलर ने भी नेता जी के बुद्धिमानी का लोहा माना था.. बात तब की है जब दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था ऐसे में हिटलर को भी अपनी जान का खतरा था… वो किसी ने जल्दी मिलता नही था.. लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए वो अपनी एक डबल बॉडी रखता था जो दिखने में एक दम हिटलर जैसे ही थे.. इसी दौरान नेता जी हिटलर से मिलने पहुँचते हैं..नेता जी से मिलने  हिटलर की शक्ल का एक व्यक्ति आया और नेताजी की तरफ हाथ बढ़ाया. नेताजी ने हाथ तो मिला लिया लेकिन मुस्कुराकर बोले- आप हिटलर नहीं हैं मैं उनसे मिलने आया हूं.


वह चौंक गया और वापस चला गया. थोड़ी देर बाद हिटलर जैसा दिखने वाला एक और व्यक्ति नेता जी से मिलने आया. हाथ मिलाने के बाद नेताजी ने उससे भी यही कहा कि वे हिटलर से मिलने आए हैं ना कि उनके बॉडी डबल से. इसके बाद खुद हिटलर नेता जी मिलने पहुंचा.. इस बार नेता जी ने हिटलर को पहचान लिया और अपनी पहचान बताई.. ” मैं सुभाष हूं… भारत से आया हूं.. आप हाथ मिलाने से पहले कृपया दस्ताने उतार दें क्योंकि मैं मित्रता के बीच में कोई दीवार नहीं चाहता.” नेताजी की तेजी देखकर हिटलर हैरान हो गया.. उसने एक सवाल पुछा कि आप बताइए कैसे पहचाना कि बाकी दो नकली है और हिटलर मैं ही हूँ.. तो नेता जी ने कहा कि उन दोनों ने अभिवादन के लिए पहले हाथ बढ़ाया जबकि ऐसा मेहमान करते हैं.’ इसके बाद हिटलर भी नेता जी का कायल हो गया था.

नेताजी की 125वीं जयंती को इस बार सरकार ने ‘‘पराक्रम दिवस’’ के रूप में मनाने का फैसला किया है और देश भर में व्यापक स्तर पर कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है.