आर्टिफिशयल बारिश कैसे होती है? क्यों अरब कृतिम बारिश करने पर हुआ मजबूर

हाल ही संयुक्त अरब अमीरात ने गर्मी से बचने के लिए अपने यहाँ आर्टिफिशयल बारिश करवाई. मतलब ये कि बारिश प्राकृतिक रूप से नही हुई बल्कि इसके लिए वैज्ञानिकों ने अपना तिकड़म लगाया था. हालाँकि आपको जानकारी हैरानी होगी कि भारत में बहुत पहले से कृतिम बारिश करवाई जाती रही है और भारत इस मामले में आगे निकल चुका है..
भारत में कहाँ कहाँ कृतिम बारिश करवाई गयी है और कहाँ कहाँ कृतिम बारिश करवाए जाने की योजना थी.. क्यों करवाई गयी थी सब आपके आगे बतायेंगे लेकिन कृतिम बारिश से जुडी कुछ ख़ास बातों पर एक नजर डालते हैं..

 

संयुक्त अरब अमीरात ने हाल ही में ड्रोन  के जरिए बादलों को इलैक्ट्रिक चार्ज करके अपने यहां आर्टिफिशियल बारिश कराई. ये बारिश कराने की नई तकनीक है और खर्चीला भी. इसमें बादलों को बिजली का झटका देकर बारिश कराई गई. इलैक्ट्रिक चार्ज होते ही बादलों में घर्षण हुआ और दुबई और आसपास के शहरों में जमकर बारिश हुई. कृत्रिम बारिश करना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है.  पुरानी और सबसे ज्यादा प्रचलित तकनीक में विमान या रॉकेट के जरिए ऊपर पहुंचकर बादलों में सिल्वर आयोडाइड मिला दिया जाता है. सिल्वर आयोडाइड प्राकृतिक बर्फ की तरह ही होती है. इसकी वजह से बादलों का पानी भारी हो जाता है और बरसात हो जाती है.

क्लाउड सीडिंग के लिए बादल का होना जरूरी है.. आयोडाइड का छिड़काव किया जाता है. इसकी वजह से भाप पानी की बूंदों में बदल जाती है. इनमें भारीपन आ जाता है और ग्रैविटी की वजह से ये धरती पर गिरती है जिसे हम कृतिम बारिश कहते हैं.

50-60 के दशक में ऑस्ट्रेलिया, 60-70 दशक के बीच अमेरिका में कराई गयी थी. कृतिम बारिश का साहारा चीन में लेता रहा है लेकिन हाल ही चीन ने कोई कृतिम बारिश करवाई हो ऐसी कोई जानकारी नही है.

लेकिन दिल्ली में साल 2018 में कृतिम बारिश कराये जाने की पूरी योजना तैयार थी. उस वक्त दिल्ली में प्रदुषण की स्थिति को देखते हुए  आईआई टी कानपुर ने इसके लिए पूरी तैयारी कर ली थी यहाँ तक कि विमान भी तय कर लिया गया था जिसका उपयोग कृतिम बारिश के लिए किया जाना था लेकिन अंत में मौसम अनुकूल ना होने की वजह से इस योजना को रोकना पड़ गया था. महाराष्ट्र और लखनऊ के कुछ हिस्सों में पहले ही कृतिम बारिश करवाई जा चुकी है लेर्किन कभी प्रदुषण के लिहाज से बड़े हिस्से पर बारिश करवाए जाने का कोई योजना पहले नही बनी है.

भारत में सबसे पहले कृतिम बारिश का प्रयोग 1951 में हुआ था जब मौसम विभाग के पहले महानिदेशक एस के चटर्जी बने और वे खुद बादल विज्ञानी थी. तब उन्होंने हाइड्रोजन गैस से भरे गुब्बारों में नमक और सिल्वर आयोडाइड को बादलों के ऊपर भेजकर कृत्रिम बारिश कराई थी.

फिर टाटा फर्म ने 1951 में वेस्टर्न घाट में कई जगहों पर इस तरह की बारिश कराई. पुणे के रैन एंड क्लाउड इंस्टीट्यूट ने उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र कई इलाकों में कृतिम बारिश करवाई थी, 1983, 84 साल 93-94 में सूखे से निपटने के लिए तमिलनाडु में, 2003-04 में कर्नाटक में बारिश करवाई गयी थी. वर्ष 2008 में आंध्र प्रदेश के 12 जिलों कृतिम बारिश करवाए जाने की योजना थी लेकिन मौसम अनुकूल न होने की वजह से रद्द करना पड़ा था.

दरअसल वैज्ञानिकों का कहना है कि गर्मियों के मौसम में बारिश करना आसान है ठंडी के मुकाबले.. क्योंकि ठण्ड में बादलों में नमी कम होती है.