मौसम बदलाव के साथ ही खान-पान पर दें ध्यान, वरना पेट करेगा परेशान

  • आयुर्वेदाचार्य ने कहा, पानी उबालकर ही पियें, ताजा खाना खायें

लखनऊ:  आयुर्वेद के अनुसार हमारा शरीर कफ, वात और पित्त के संतुलन पर निर्भर है। इनके असंतुलन से ही रोग होता है। मौसम का बदलाव पित्त को ज्यादा प्रभावित करता है। इस कारण वर्तमान में बदल रहे मौसम में लोगों को पित्त कारक चीजों के खाने से बचना चाहिए, वरना पेट से संबंधित तमाम बीमारियां हो सकती हैं। यह सलाह बीएचयू के पंचकर्म विभाग के विभागाध्यक्ष डाक्टर जेपी सिंह ने दी।

उन्होंने कहा कि मौसम बदलाव के साथ ही ज्यादा मसाला, तली-भुनी चीजों को खाने से बचना चाहिए। ज्यादा देर का बना खाना खाने से भी रोग होने का खतरा बना रहता है। लोगों को पानी भी उबाल कर पीना चाहिए, क्योंकि इस मौसम में सर्वाधिक खतरा दूषित पानी से ही होता है। यदि पानी की स्वच्छता बनी रहे तो आधे से अधिक रोग ऐसे ही पास नहीं फटकेंगे।

आयुर्वेदाचार्य जेपी सिंह ने हिन्दुस्थान समाचार से कहा कि पित्त गर्भावस्था में भी महिलाओं को पित्त ज्यादा बना है, अंतिम माह में अम्लता की अधिकता महसूस होने लगती है। आयुर्वेदाचार्य ने कहा कि एसीडीटी का एक कारण कारण एच. पायलोरी जीवाणु भी है। यह संक्रमण दूषित खान-पान से होता है। इससे बचने का एक ही तरीका है, खाने-पीने की चीजों पर ध्यान दिया जाय। एसिडिटी की शुरुवात मुंह में पानी छूटकर और जी मचलने से होती है। ऍसिडिटी का दर्द सादे भोजन से कम होता है, लेकिन तीखे भोजन से तुरंत शुरू होता है। अम्लपित्तवाला दर्द छाती और नाभी के दरम्यान अनुभव होता है। जलन निरंतर होती है लेकिन ऐंठन-दर्द रूक रूक के होता है। कभी कभी दर्द असहनीय होता है।

डाक्टर जेपी सिंह ने कहा कि अम्लपित्त या जलन तत्कालिक हो तो अकसर उल्टी से ठीक हो जाती है। अन्यथा अन्न पाचन के बाद आगे चलकर याने 1-2 घंटों में तकलीफ रूक जाती है। अम्लपित्त जलन पर एक सरल उपाय है अंटासिड की दवा। इसकी 1-2 गोली चबाकर निगले या 5-10 मिली. पतली दवा पी ले। मॅग्नेशियम और कॅल्शियमयुक्त अंटासिड जादा उपयोगी है। आयुर्वेद के अनुसार सूतशेखर मात्रा अंटासिड के लिये एक अच्छा विकल्प है।